All Study Notes
News Update
Loading...

17 June 2021

बाल विकास की अवधारणा

समय के साथ किसी व्यक्ति में हुए गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन को उस व्यक्ति का विकास कहा जाता है। विकास के कई आयाम होते हैं, जैसे- शारीरिक विकास, सामाजिक विकास, संज्ञानात्मक विकास, भाषायी विकास, मानसिक विकास आदि। किसी बालक में समय के साथ हुए गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन को बाल विकास कहा जाता है। बालक के शारीरिक, मानसिक एवं अन्य प्रकार के विकास कुछ विशेष प्रकार के सिद्धान्तों पर ढले हुए प्रतीत होते हैं। इन सिद्धान्तों को बाल विकास का सिद्धान्त कहा जाता है।

बाल विकास की अवधारणा



बाल विकास के सिद्धान्तों का ज्ञान शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने के लिए आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं सिद्धान्तों के ज्ञान के आधार पर शिक्षक बालक-बालिकाओं में समय के साथ हुए परिवर्तनों एवं उनके प्रभावों के साथ-साथ अधिगम से इसके सम्बन्धों को समझते हुए किसी विशेष शिक्षण प्रक्रिया को अपनाता है। किसी निश्चित आयु के बालकों की पाठ्यक्रम सम्बन्धी क्रियाओं को नियोजित करते समय शिक्षक को यह जानना आवश्यक हो जाता है कि उस आयु के बालकों में सामान्यत: किस प्रकार की शारीरिक व मानसिक क्षमता है, उन्हें किस प्रकार की सामाजिक क्रियाओं में लगाया जा सकता है तथा वे अपने संवेगों पर कितना नियन्त्रण रख सकते हैं? इसके लिए शिक्षक को उस आयु के सामान्य बालकों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिपक्वता के स्तर का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे वह उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करके उन्हें अपेक्षित दिशा प्रदान कर सके।

बाल विकास के सिद्धान्‍त


निरन्तरता का सिद्धान्त Principle of Continuity

इस सिद्धान्त के अनुसार विकास एक न रुकने वाली प्रक्रिया है। माँ के गर्भ से ही यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और मृत्यु-पर्यन्त चलती रहती है। एक छोटे से नगण्य आकार से अपना जीवन प्रारम्भ करके हम सबके व्यक्तित्व के सभी पक्षों-शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि का सम्पूर्ण विकास इसी निरन्तरता के गुण के कारण भली-भाँति सम्पन्न होता रहता है।

वैयक्तिक अन्तर का सिद्धान्‍त

इस सिद्धान्त के अनुसार बालकों का विकास और वृद्धि उनकी अपनी वैयक्तिकता के अनुरूप होती है। वे अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते रहते हैं और इसी कारण उनमें पर्याप्त विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। कोई भी एक बालक वृद्धि और विकास की दृष्टि से किसी अन्य बालक के समरूप नहीं होता। विकास के इसी सिद्धान्त के कारण कोई बालक अत्यन्त मेधावी, कोई बालक सामान्य तथा कोई बालक पिछड़ा या मन्द होता है।

विकास क्रम की एकरूपता

यह सिद्धान्त बताता है कि विकास की गति एक जैसी न होने तथा पर्याप्त वैयक्तिक अन्तर पाए जाने पर भी विकास क्रम में कुछ एकरूपता के दर्शन होते हैं। इस क्रम में एक ही जाति विशेष के सभी सदस्यों में कुछ एक जैसी विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए मनुष्य जाति के सभी बालकों की वृद्धि सिर की ओर प्रारम्भ होती है। इसी तरह बालकों के गत्यात्मक और भाषा विकास में भी एक निश्चित प्रतिमान और क्रम के दर्शन किए जा सकते हैं।

वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक-सी नहीं रहती

विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती तो है, किन्तु इस प्रक्रिया में विकास की गति हमेशा एक जैसी नहीं होती। शैशवावस्था के शुरू के वर्षों में यह गति कुछ तीव्र होती है, परन्तु बाद के वर्षों में यह मन्द पड़ जाती है। पुन: किशोरावस्था के प्रारम्भ में इस गति में तेजी से वृद्धि होती है, परन्तु यह अधिक समय तक नहीं बनी रहती। इस प्रकार वृद्धि और विकास की गति में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। किसी भी अवस्था में यह एक जैसी नहीं रह पाती। -

विकास सामान्य से विशेष की ओर चलता है

विकास और वृद्धि की सभी दिशाओं में विशिष्ट क्रियाओं से पहले उनके सामान्य रूप के दर्शन होते हैं। उदाहरण के लिए अपने हाथों से कुछ चीज पकड़ने से पहले बालक इधर से उधर यूँ ही हाथ मारने या फैलाने की चेष्टा करता है। इसी तरह शुरू में एक नवजात शिशु के रोने और चिल्लाने में उसके सभी अंग-प्रत्यंग भाग लेते हैं, परन्तु बाद में वृद्धि और विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप यह क्रियाएँ उसकी आँखों और वाक्तन्त्र तक सीमित हो जाती हैं। भाषा विकास में भी बालक विशेष शब्दों से पहले सामान्य शब्द ही सीखता है। पहले वह सभी व्यक्तियों को 'पापा' कहकर ही सम्बोधित करता है, इसके पश्चात् ही वह केवल अपने पिता को 'पापा' कहकर सम्बोधित करना सीखता है।

परस्पर-सम्‍बन्‍ध का सिद्धान्‍त

विकास के सभी आयाम जैसे- शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित हैं। इनमें से किसी भी एक आयाम में होने वाला विकास अन्य सभी आयामों में होने वाले विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए जिन बच्चों में औसत से अधिक वृद्धि होती है, वे शारीरिक और सामाजिक विकास की दृष्टि से भी काफी आगे बढ़े हुए पाए जाते हैं। दूसरी ओर, एक क्षेत्र में पाई जाने वाली दूसरे क्षेत्र में हो रही प्रगति में बाधक सिद्ध होती है। यही कारण है कि शारीरिक विकास की दृष्टि से पिछड़े बालक संवेगात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास में भी उतने ही पीछे रह जाते हैं।

एकीकरण का सिद्धान्त

विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धान्त का पालन करती है। इसके अनुसार, बालक पहले सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है। इसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है। सामान्य से विशेष की ओर बढ़ते हुए विशेष प्रतिक्रियाओं तथा चेष्टाओं को इकट्ठे रूप में प्रयोग में लाना सीखता है।

उदाहरण के लिए, एक बालक पहले पूरे हाथ को, फिर अँगुलियों को फिर हाथ एवं अँगुलियों को एकसाथ चलाना सीखता है।

विकास की भविष्यवाणी की जा सकती हैं

एक बालक की अपनी वृद्धि और विकास की गति को ध्यान में रखकर उसके आगे बढ़ने की दिशा और स्वरूप के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है। उदाहरण के लिए, एक बालक की कलाई की हड्डियों का एक्स किरणों से लिया जाने वाला चित्र यह बता सकता है कि उसका आकार-प्रकार आगे जाकर किस प्रकार का होगा? इसी तरह बालक को इस समय की मानसिक योग्यताओं के ज्ञान के सहारे उसके आगे के मानसिक विकास के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

विकास की दिशा का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार, विकास की प्रक्रिया पूर्व निश्चित दिशा में आगे बढ़ती है। विकास की प्रक्रिया की यह दिशा व्यक्ति के वंशानुगत एवं वातावरण जन्य कारकों से प्रभावित होती है। इसके अनुसार बालक सबसे पहले अपने सिर और भुजाओं की गति पर नियन्त्रण करना सीखता है और उसके बाद फिर टाँगों को। इसके बाद ही वह अच्छी तरह बिना सहारे के खड़ा होना और चलना सीखता है।

विकास लम्बवत् सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है

बालक का विकास लम्बवत् सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है। वह एक-सी गति से सीधा चलकर विकास को प्राप्त नहीं होता, बल्कि बढ़ते हुए पीछे हटकर अपने विकास को परिपक्व और स्थायी बनाते हुए वर्तुलाकार आकृति की तरह आगे बढ़ता है। किसी एक अवस्था में वह तेजी से आगे बढ़ते हुए उसी गति से आगे नहीं जाता, बल्कि अपनी विकास की गति को धीमा करते हुए वर्षों में । विश्राम लेता हुआ प्रतीत होता है ताकि प्राप्त वृद्धि और विकास को स्थायी रूप दिया जा सके। यह सब करने के पश्चात् ही वह आगामी वर्षों में फिर कुछ आगे बढ़ने की चेष्टा कर सकता है।

वृद्धि और विकास की क्रिया वंशानुक्रम और वातावरण का संयुक्त परिणाम

बालक की वृद्धि और विकास को किसी स्तर पर वंशानुक्रम और वातावरण की संयुक्त देन माना जाता है। दूसरे शब्दों में, वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में वंशानुक्रम जहाँ आधार का कार्य करता है वहाँ वातावरण इस आधार पर बनाए जाने वाले व्यक्तित्व सम्बन्धी भवन के लिए आवश्यक सामग्री एवं वातावरण जुटाने में सहयोग देता है। अत: वृद्धि और विकास की प्रक्रियाओं में इन दोनों को समान महत्व दिया जाना आवश्यक हो जाता है।

बाल विकास को प्रभावित करने वाले आन्तरिक कारक

बालक के विकास की प्रक्रिया आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से प्रभावित होती है।

वंशानुगत कारक 

बालक के रंग-रूप, आकार, शारीरिक गठन, ऊँचाई इत्यादि के निर्धारण में उसके आनुवंशिक गुणों का महत्वपूर्ण हाथ होता है। बालक के आनुवंशिक गुण उसकी वृद्धि एवं विकास को भी प्रभावित करते हैं। यदि बालक के माता-पिता गोरे हैं, तो उनका बच्चा गोरा ही होगा, किन्‍तु यदि काले है तो उनके बच्‍चे काले ही होगे। इसी प्रकार माता-पिता के अन्य गुण भी बच्चे में आनुवंशिक रूप से चले जाते हैं। इसके कारण कोई बच्चा अति प्रतिभाशाली एवं सुन्दर हो सकता है एवं कोई अन्य बच्चा शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर।

शारीरिक कारण

जो बालक जन्म से ही दुबले-पतले, कमजोर, बीमार तथा किसी प्रकार की शारीरिक बाधा से पीड़ित रहते हैं, उनकी तुलना में सामान्य एवं स्वस्थ बच्चे का विकास अधिक होना स्वाभाविक ही है। शारीरिक कमियों का स्वास्थ्य ही नहीं वृद्धि एवं विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। असन्तुलित शरीर, मोटापा, कम ऊँचाई, शारीरिक असुन्दरता इत्यादि बालक के असामान्य व्यवहार के कारण होते हैं। कई बार किसी दुर्घटना के कारण भी शरीर को क्षति पहॅुंचती है और इस क्षति का बालक के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

बुद्धि

 बुद्धि को अधिगम (सीखने) की योग्यता, समायोजन योग्यता, निर्णय लेने की क्षमता इत्यादि के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिस प्रकार बालक के सीखने की गति अधिक होती है, उसका मानसिक विकास भी तीव्र गति से होगा। बालक अपने परिवार समाज एवं विद्यालय में अपने आपको किस तरह समायोजित करता है यह उसकी बुद्धि पर निर्भर करता है।

संवेगात्‍मक कारक

बालक में जिस प्रकार के संवेगों का जिस रूप में विकास होगा वह उसके सामाजिक मानसिक, नैतिक, शारीरिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यदि बालक अत्यधिक क्रोधित या भयभीत रहता है अथवा यदि उसमें ईष्य एवं वैमनस्यता की भावना अधिक होती है, तो उसके विकास की प्रक्रिया पर इन सबक प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। संवेगात्मक रूप से असन्तुलित बालक पढ़ाई में व किसी अन्य गम्भीर कार्यों में ध्यान नहीं दे पाते, फलस्वरूप उनका मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।

सामाजिक प्रकृति

बच्चा जितना अधिक सामाजिक रूप से सन्तुलित होगा उसका प्रभाव उसके शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, भौतिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास पर भी उतना ही अनुकूल पड़ेगा। सामाजिक दृष्टि से कुशल बालक अपने वातावरण से दूसरों की अपेक्षा अधिक सीखता है।

बाल विकास को प्रभावित करने वाले बाह्य कारक

बाल के विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने में उपरोक्‍त आन्‍तरिक कारकों के साथ्‍

गर्भावस्था के दौरान माता का स्वास्थ्य एवं परिवेश

गर्भावस्था में माता को अच्छा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने की सलाह इसलिए दी जाती है कि उससे न केवल गर्भ के अन्दर बालक के विकास पर असर पड़ता है बल्कि आगे के विकास की बुनियाद भी मजबूत होती है। यदि माता का स्वास्थ्य अच्छा न हो, तो उसके बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य की आशा कैसे की जा सकती है? और यदि बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा न होगा तो उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है।

जीवन की घटनाऍ

जीवन की घटनाओं का बालक के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। यदि बालक के साथ अच्छा व्यवहार हुआ है, तो उसके विकास की गति सही होगी अन्यथा उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जिस बच्चे को उसकी माता ने बचपन में ही छोड़ दिया हो वह माँ के प्यार के लिए तरसेगा ही। ऐसी स्थिति में उसके सर्वागीण विकास के बारे में कैसे सोचा जा सकता है? जीवन की किसी दुर्घटना का भी बालक के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

बाल विकास की अवधारणा

भौतिक वातावर्ण

बालक का जन्म किस परिवेश में हुआ, वह किस परिवेश में किन लोगों के साथ रह रहा है? इन सबका प्रभाव उसके विकास पर पड़ता है। परिवेश की कमियों, प्रदूषणों, भौतिक सुविधाओं का अभाव इत्यादि कारणों से भी बालक का विकास प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है।

सामाजिक-आर्थिक स्थिति

बालक की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी उसके विकास पर पड़ता है। निर्धन परिवार के बच्चे को विकास के अधिक अवसर उपलब्ध नहीं होते। अच्छे विद्यालय में पढ़ने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने इत्यादि का अवसर गरीब बच्चों को नहीं मिलता, इसके कारण उनका विकास सन्तुलित नहीं होता। शहर के अमीर बच्चों को गाँवों के गरीब बच्चों की मानसिक एवं सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से अधिक होता है।

बाल विकास के सिद्धान्तों का शैक्षिक महत्व

बाल विकास के सिद्धान्तों के ज्ञान के फलस्वरूप शिक्षकों को बालकों की स्वभावगत विशेषताओं, रुचियों एवं क्षमताओं के अनुरूप सफलतापूर्वक अध्यापन में सहायता मिलती है।

बाल विकास के सिद्धान्तों से शिक्षकों को यह पता चलता है कि वृद्धि और विकास की गति और मात्रा सभी बालकों में एक जैसी नहीं पाई जाती। अत: व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए सभी बालकों से हर प्रकार के विकास की समान उम्मीद नहीं की जा सकती।

निचली कक्षाओं में शिक्षण की खेल-पद्धति मूलरूप से वृद्धि एवं विकास के मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है। बाल विकास के सिद्धान्तों से हमें यह जानकारी मिलती है कि विकास की किस अवस्था में बालकों में सीखने की प्रवृत्ति किस प्रकार की होती है? यह उचित शिक्षण-विधि अपनाने में शिक्षकों की सहायता करता है।

बालकों की वृद्धि और विकास के सिद्धान्तों से बालकों के भविष्य में होने वाली प्रगति का अनुमान लगाना काफी हद तक सम्भव होता है। इस तरह बाल विकास के सिद्धान्तों की जानकारी बालकों के मार्गदर्शन, परामर्श एवं निर्देशन में सहायक होकर उनके भविष्य निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाती है। बाल विकास के सिद्धान्तों से हमें यह भी पता चलता है कि एक ही मानव प्रजाति के सदस्यों में वृद्धि और विकास से सम्बन्धित कुछ समानताएँ पाई जाती हैं।

यदि बालक का विकास इस अनुरूप नहीं हो रहा हो, तो इस सिद्धान्त की जानकारी के अनुसार उसमें सुधार के प्रयास किए जा सकते हैं। वंशानुक्रम तथा वातावरण दोनों मिलकर बालक की वृद्धि और विकास के लिए उत्तरदायी हैं, कोई एक नहीं। इस बात का ज्ञान वातावरण में आवश्यक सुधार लाकर बालकों की प्रगति में सहायक बनने में शिक्षकों की मदद करता है। वंशानुक्रम और वातावरण दोनों बालक की वृद्धि और विकास के लिए उत्तरदायी हैं। यह सिद्धान्त हमें बताता है कि बालक की वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में वंशानुक्रम और वातावरण दोनों को समान महत्व दिया जाना आवश्यक है। वृद्धि और विकास की सभी दिशाएँ अर्थात् विभिन्न पहलू जैसेमानसिक विकास, शारीरिक विकास, संवेगात्मक विकास और सामाजिक विकास आदि परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। 

इस बात का ज्ञान शिक्षकों और अभिभावकों को बालक के सर्वागीण विकास पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है। आने वाले समय में वृद्धि और विकास को ध्यान में रखते हुए क्या-क्या विशेष परिवर्तन होंगे? इस बात का ज्ञान भी बाल विकास के सिद्धान्तों के आधार पर हो सकता है। यह ज्ञान न केवल अध्यापकों बल्कि माता-पिता को भी विशेष रूप से तैयार रहने के लिए एक आधार प्रदान करता है तथा बच्चों की विभिन्न समस्याओं का समाधान करने में उन्हें सहायता मिलती है। बाल विकास के सिद्धान्तों के ज्ञान से बालक की रुचियों, अभिवृत्तियों, क्षमताओं इत्यादि के अनुरूप उचित पाठ्यक्रम के निर्धारण एवं समय-सारिणी के निर्माण में सहायता मिलती है।

बालक के व्यक्तित्व के सर्वागीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि उसके व्यवहार की जानकारी शिक्षक को हो। बालक के व्यवहार के बारे में जानने के बाद उसकी समस्याओं का समाधान करना आसान हो जाता है। बाल विकास का अध्ययन शिक्षक को इस बात की स्पष्ट जानकारी दे सकता है कि बालक की शक्तियों, योग्यताओं, क्षमताओं तथा व्यवहार एवं व्यक्तिगत गुणों के विकास में आनुवंशिकी तथा वातावरण किस सीमा तक किस रूप में उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं? यह जानकारी शिक्षक को अपने उत्तरदायित्वों का सही ढंग से पालन करने में सहायक होती है।

किस आयु वर्ग या अवस्था विशेष में बालक के विकास का क्या सामान्य स्तर होना चाहिए? इस बात के ज्ञान से अध्यापक को अपने शिक्षण के उचित नियोजन में पूरी सहायता मिलती है। विकास स्तर की दृष्टि से वह बालकों को सामान्य, अति सामान्य तथा सामान्य से नीचे जैसी श्रेणियों में विभाजित कर सकता है तथा फिर उनकी शिक्षा एवं समायोजन व्यवस्था को उन्हीं के उपयुक्त रूप में ढालने का प्रयत्न कर सकता है।

वृद्धि एवं विकास के विभिन्न आयामों में से किसी एक आयाम में बहुत अधिक तथा किसी दूसरे में उपेक्षित न रह जाए-इस बात को ध्यान में रखकर सर्वागीण विकास के लिए प्रयत्नरत रह सकता है।

विकास की प्रक्रिया विभिन्न आयु वर्ग तथा अवस्था विशेष में किस प्रकार सम्पन्न होती है?

 वह किन बातों से किस रूप में प्रभावित होती है? इस बात का ज्ञान अध्यापक को ऐसी उपयुक्त शिक्षण अधिगम परिस्थितियों तथा विकास वातावरण के निर्माण में सहयोग दे सकता है, जिससे बालकों का अधिक-से-अधिक पूर्ण एवं सर्वागीण विकास हो सके।

16 June 2021

बाल विकास के अवरोधक

  • बाल विकास की प्रक्रिया आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से प्रभावित होती है।
  • वंशानुगत कारक, शारीरिक कारक, बुद्धि, संवेगात्मक कारक, सामाजिक कारक इत्यादि बाल विकास को प्रभावित करने वाले आन्तरिक कारक हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक स्थिति एवं वातावरण जन्य अन्य कारक बालक के विकास को प्रभावित करने वाले बाह्य कारक हैं।
  • मानव-व्यक्तित्व आनुवंशिकता और वातावरण की अन्तःक्रिया का परिणाम होता है।

  • बाल विकास के अवरोधक

आनुवंशिकता का स्‍वरूप तथा अवधारणा

आनुवंशिक गुणों के एक पीढ़ी-से-दूसरी पीढ़ी में संचरित होने की प्रक्रिया को आनुवंशिकता या वंशानुक्रम (Heredity) कहा जाता है। आनुवंशिक लक्षणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरण की विधियों और कारणों के अध्ययन को आनुवंशिकी (Genetics) कहा जाता है। आनुवंशिकता को स्थिर सामाजिक संरचना माना जाता है। एक व्यक्ति के वंशानुक्रम में वे सब शारीरिक बनावटें, शारीरिक विशेषताएँ क्रियाएँ या क्षमताएँ सम्मिलित रहती हैं, जिनको वह अपने माता-पिता, अन्य पूर्वजों या प्रजाति से प्राप्त करता है।

आनुवंशिकता जनन प्रक्रम का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम संतति के जीवों के समान डिजाइन (अभिकल्पना) का होना है। आनुवंशिकता नियम इस बात का निर्धारण करते हैं जिनके द्वारा विभिन्न लक्षण पूर्ण विश्वसनीयता के साथ वंशागत होते हैं। ड संतति में जनक के अधिकतर आधारभूत लक्षण होते हैं। जिन्हें वंशागत लक्षण कहते हैं। ऐसे लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होते रहते हैं। आनुवंशिकता का मूलाधार कोष (Cell) है जिस प्रकार एक-एक ईंटों को चुनकर इमारत बनती है ठीक उसी प्रकार से कोषों के द्वारा मानव शरीर का निर्माण होता है।

गर्भधारण के समय माँ के अण्डाणु और पिता के शुक्राणु का कोषों में मिलन होता है ताकि एक नये कोष की रचना हो सके। कोषों के केन्द्रक (न्यूक्लियस) के कणों को गुणसूत्र (क्रोमोसोम्स) कहते हैं। गुणसूत्रों का अस्तित्व युग्मों में होता है। मानव कोष में 46 गुणसूत्र होते हैं जो 23 युग्मों में व्यवस्थित होते हैं। प्रत्येक युग्म में से एक माँ से आता है और दूसरा पिता से और ये गुणसूत्र आनुवंशिकी सूचना को संचारित करते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र (क्रोमोसोम) में बहुत बड़ी संख्या में जीन्स होते हैं, जोकि शारीरिक लक्षणों के वास्तविक वाहक हैं।

मॉण्टेग्यू और शील फेण्ड के अनुसार प्रत्येक गुणसूत्र में 3000 जीन्स पाए जाते हैं। जीन्स ही व्यक्ति की विभिन्न योग्यताओं एवं गुणों के निर्धारक होते हैं।

आनुवंशिकता का प्रभाव


शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव

बालक के रंग-रूप, आकार, शारीरिक गठन, ऊँचाई इत्यादि के निर्धारण में उसके आनुवंशिक गुणों का महत्वपूर्ण हाथ होता है। माता के गर्भ में निषेचित युग्मज (जाइगोट) मिलकर क्रोमोसोम्स के विविध संयोजन (कॉम्बीनेशन्स) बनाते हैं। इस प्रकार एक ही माता-पिता के प्रत्येक बच्चे से विभिन्न जीन्स बच्चे में अपने अथवा रक्त सम्बन्धियों के साथ अन्यों से अधिक समानताएँ होती हैं। आनुवंशिक संचारण (ट्रांसमिशन) एक अत्यन्त जटिल प्रक्रिया है। मनुष्यों में हमें दृष्टिगोचर होने वाले अधिकांश अभिलक्षण, असंख्य जीन्स का संयोजन होता है।

जीन्स के असंख्य प्रतिवर्तन (परम्युटेशन्स) और संयोजन (कॉम्बीनेशन्स) शारीरिक और मनोवैज्ञानिक अभिलक्षणों में अत्यधिक विभेदों के लिए जिम्मेदार होते हैं। केवल समान अथवा मोनोजाइगोटिक ट्विन्स में एकसमान सेट के गुणसूत्र (क्रोमोसोम्स) और जीन्स होते हैं क्योंकि वे एक ही युग्मज (सिंगल जाइगोट) के द्विगुणन (डुप्लिकेशन) से बनते हैं। अधिकांश जुड़वाँ भ्रातृवत अथवा द्वि-युग्मक होते हैं जो दो पृथक् युग्मजों से विकसित होते हैं। यह भाइयों जैसे जुड़वाँ भाई और बहनों की तरह मिलते-जुलते होते हैं, परन्तु वे अनेक प्रकार से परस्पर एक-दूसरे से भिन्न भी होते हैं। बालक के आनुवंशिक गुण उसकी वृद्धि एवं विकास को भी प्रभावित करते हैं।

यदि बालक के माता-पिता गोरे हैं तो उनका बच्चा गोरा ही होगा, किन्तु यदि माता-पिता काले हैं तो उनके बच्चे काले ही होंगे। इसी प्रकार माता-पिता के अन्य गुण भी बच्चे में आनुवंशिक रूप से चले जाते हैं। इसके कारण कोई बच्चा अति प्रतिभाशाली एवं सुन्दर हो सकता है एवं कोई अन्य बच्चा शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर। जो बालक जन्म से ही दुबले-पतले, कमजोर, बीमार तथा किसी प्रकार की शारीरिक बाधा से पीड़ित रहते हैं, उनकी तुलना में सामान्य एवं स्वस्थ बच्चे का विकास अधिक होना स्वाभाविक ही है। शारीरिक कमियों का स्वास्थ्य ही नहीं वृद्धि एवं विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। असन्तुलित शरीर, मोटापा, कम ऊँचाई, शारीरिक असुन्दरता इत्यादि बालक के असामान्य व्यवहार के कारण होते हैं। कई बार किसी दुर्घटना के कारण भी शरीर को क्षति पहुँचती है और इस क्षति का बालक के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

आनुवंशिकता (वंशानुक्रम) की परिभाषाएँ

  • जेम्स ड्रेवर "शारीरिक तथा मानसिक विशेषताओं का माता-पिता से सन्तानों में हस्तान्तरण होना आनुवंशिकता है।” 
  • रूथ बैनलेक्ट वंशनुमान माता-पिता से सन्तानों के प्रतिहने वाले ! गुण है।”
  • पी जिसबर्ट ‘प्रकृति में पीढ़ी का प्रत्येक कार्य कुछ जैविकीय अथवा मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को माता-पिता द्वारा उनकी सन्तानों में हस्तान्तरित करना ही आनुवंशिकता है।”
  • एच ए पेटरसन एवं बुडवर्थ ‘’ व्‍यक्ति अपने माता पिता के माध्‍यम से पूर्वजों की जो विशेषताएँ प्राप्त करता है, उसे वंशानुक्रम कहते हैं। है।”
  • जीव शास्त्रियों के अनुासा ‘’ निषिक्‍त अण्‍ड में सम्‍भावित विद्यमान विशिष्ट गुणों का योग ही आनुवंशिकता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वंशानुक्रम या आनुवंशिकता ; पूर्वजों या माता-पिता द्वारा सन्तानों में होने वाले गुणों का संक्रमण ! है। प्रत्येक प्राणी अपनी जातीय विशेषताओं के आधार पर शारीरिक , मानसिक गुणों का हस्‍तान्‍तरण सन्‍तानों में करते है।

शारीरिक लक्षणों के वाहक जीन प्रखर अथवा प्रतिगामी दोनों प्रकार के हो सकते हैं। यह एक ज्ञात सत्य है कि किन्हीं विशेष रंगों के लिए पुरुष और महिला में रंगों को पहचानने की अन्धता (कलर ब्लाइण्ड नेस) अथवा किन्हीं विशिष्ट रंगों की संवेदना नारी में नर से अधिक हो सकती है। एक दादी और माँ, स्वयं रंग-अन्धता से ग्रस्त हुए बिना किसी नर शिशु को यह स्थिति हस्तान्तरित कर सकती है। ऐसी स्थिति इसलिए है क्योंकि यह विकृति प्रखर होती है, परन्तु महिलाओं में यह प्रतिगामी (रिसेसिव) होती है।

जीन्स जोड़ों में होते हैं। यदि किसी जोड़े में दोनों जीन प्रखर होंगे तो उस व्यक्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखाई देगा (जैसे रंगों को पहचानने की अन्धता), यदि एक जीन प्रखर हो और दूसरा प्रतिगामी, तो जो प्रखर होगा वही अस्तित्व में रहेगा।

प्रतिगामी जीन आगे सम्प्रेषित हो जाएगा और यह अगली किसी पीढ़ी में अपने लक्षण प्रदर्शित कर सकता है। अत: किसी व्यक्ति में किसी विशिष्ट लक्षण के दिखाई देने के लिए प्रखर जीन ही जिम्मेदार होता है। जो अभिलक्षण दिखाई देते हैं और प्रदर्शित होते हैं, जैसे आँखों का रंग, उन्हें समलक्षणी (फिनोटाइप्स) कहते हैं। ड प्रतिगामी जीन अपने लक्षण प्रदर्शित नहीं करते, जब तक कि वे अपने समान अन्य जीन के साथ जोड़े नहीं बना लेते जो अभिलक्षण आनुवंशिक रूप से प्रतिगामी जीनों के रूप में आगे संचारित हो जाते हैं परन्तु वे प्रदर्शित नहीं होते उन्हें समजीनोटाइप (जीनोटाइप) कहते हैं।

बुद्धि पर प्रभाव

बुद्धि को अधिगम (सीखने) की योग्यता, समायोजन योग्यता, निर्णय लेने की क्षमता इत्यादि के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिस बालक के सीखने की गति अधिक होती है, उसका मानसिक विकास भी तीव्र गति से होगा। बालक अपने परिवार, समाज एवं विद्यालय में अपने आपको किस तरह समायोजित करता है यह उसकी बुद्धि पर निर्भर करता है।

  • गोडार्ड का मत है कि मन्दबुद्धि माता-पिता की सन्तान मन्दबुद्धि और तीव्रबुद्धि माता-पिता की सन्तान तीव्रबुद्धि वाली होती है।
  • मानसिक क्षमता के अनुकूल ही बालक में संवेगात्मक क्षमता का विकास होता है।

बालक में जिस प्रकार के संवेगों का जिस रूप में विकास होगा वह उसके सामाजिक, मानसिक, नैतिक, शारीरिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यदि बालक अत्यधिक क्रोधित या भयभीत रहता है अथवा यदि उसमें ईष्र्या एवं वैमनस्यता की भावना अधिक होती है, तो उसके विकास की प्रक्रिया पर इन सबका प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है।

संवेगात्मक रूप से असन्तुलित बालक पढ़ाई में या किसी अन्य गम्भीर कार्यों में ध्यान नहीं दे पाते, फलस्वरूप उनका मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।

वातावरण का अर्थ

वातावरण का अर्थ पर्यावरण है। पर्यावरण दो शब्दों परि एवं आवरण के मिलने से बना है। परि का अर्थ होता है चारों ओर, आवरण का अर्थ होता है ढकना। इस प्रकार वातावरण अथवा पर्यावरण का अर्थ होता है चारों ओर घेरने वाला। प्राणी या मनुष्य जल, वायु, वनस्पति, पहाड़, पठार, नदी, वस्तु आदि से घिरा हुआ है यही सब मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। इसे वातावरण या पोषण के नाम से भी जाना जाता है। वातावरण मानव जीवन के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। मानव विकास में जितना योगदान आनुवंशिकता का है उतना ही वातावरण का भी। इसलिए कुछ मनोवैज्ञानिक वातावरण को सामाजिक वंशानुक्रम भी कहते हैं। व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों ने वंशानुक्रम से अधिक वातावरण को महत्व दिया है।

वातावरण सम्बन्धी कारक

वातावरण में वे सब तत्व आ जाते हैं, जिन्होंने व्यक्ति को जीवन आरम्भ करने के समय से प्रभावित किया है। गर्भावस्था से लेकर जीवनपर्यन्त तक अनेक प्रकार की घटनाएँ व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं उसके विकास को प्रभावित करती हैं।

गर्भावस्था में माता को अच्छा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने की सलाह इसलिए दी जाती है कि उससे न केवल गर्भ के अन्दर बालक के विकास पर असर पड़ता है बल्कि आगे के विकास की बुनियाद भी मजबूत होती है। यदि माता का स्वास्थ्य अच्छा न हो, तो उसके बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य की आशा कैसे की जा सकती है? और यदि बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा न होगा तो उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है।

जीवन की घटनाओं का बालक के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। यदि बालक के साथ अच्छा व्यवहार हुआ है, तो उसके विकास की गति सही होगी अन्यथा उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जिस बच्चे को उसकी माता ने बचपन में ही छोड़ दिया हो वह माँ के प्यार के लिए तरसेगा ही। ऐसी स्थिति में उसके सर्वागीण विकास के बारे में कैसे सोचा जा सकता है?

भौतिक परिवर्तन

इसके अन्तर्गत प्राकृतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियाँ आती हैं। मनुष्य के विकास पर जलवायु का प्रभाव पड़ता है। जहाँ अधिक सर्दी पड़ती है या जहाँ अधिक गर्मी पड़ती है । वहाँ मनुष्य का विकास एक जैसा नहीं होता है। ठण्डे प्रदेशों के व्यक्ति सुन्दर, गोरे, सुडौल, स्वस्थ एवं बुद्धिमान होते हैं। धैर्य भी इनमें अधिक होता है। जबकि गर्म प्रदेश के व्यक्ति काले, चिड़चिड़े तथा आक्रामक स्वभाव के होते हैं।

सामाजिक कारक

व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है इसलिए उस पर समाज का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। सामाजिक व्यवस्था, रहन-सहन, परम्पराएँ, धार्मिक कृत्य, रीति-रिवाज, पारस्परिक अन्त:क्रिया और सम्बन्ध आदि बहुत-से तत्व हैं जो मनुष्य के शारीरिक, मानसिक तथा भावात्मक एवं बौद्धिक विकास को किसी-न-किसी ढंग से अवश्य प्रभावित करते हैं।

आर्थिक कारक

अर्थ अर्थात् धन से केवल सुविधाएँ ही नहीं प्राप्त होती हैं बल्कि इससे पौष्टिक चीजें भी खरीदी जा सकती हैं, जिससे मनुष्य का शरीर विकसित होता है। धनहीन व्यक्ति में असुविधा के अभाव में हीन भावना विकसित हो जाती है जो विकास के मार्ग में बाधक है। आर्थिक वातावरण मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को भी प्रभावित करता है। सामाजिक विकास पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

सांस्‍कृतिक कारक  

धर्म और संस्कृति मनुष्य के विकास को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। खाने का ढंग, रहन-सहन का ढंग, पूजा-पाठ का ढंग, समारोह मनाने का ढंग, संस्कार का ढंग आदि हमारी संस्कृति हैं। जिन संस्कृतियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाहित है उनका विकास ठीक ढंग से होता है लेकिन जहाँ अन्धविश्वास और रूढ़िवाद का समावेश है उस समाज का विकास सम्भव नहीं है।

वातावरण के कुछ महत्‍वपूर्ण प्रभाव


शारीरिक अन्तर का प्रभाव

व्यक्ति के शारीरिक लक्षण वैसे तो वंशानुगत होते हैं, किन्तु इस पर वातावरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कद छोटा होता है जबकि मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगो का शरीर लम्‍बा एवं गठीला होता है। अनेक पीढ़ीयों से निवास स्थल में परिवर्तन करने के बाद उपरोक्त लोगों के कद एवं रंग में अन्तर वातावरण के प्रभाव के कारण देखा गया है।

प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव

कुछ प्रजातियों की बौद्धिक श्रेष्ठता का कारण वंशानुगत न होकर वातावरण होता है। वे लोग इसलिए अधिक विकास कर पाते हैं, क्योंकि उनके पास श्रेष्ठ शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक वातावरण उपलब्ध होता है। यदि एक महान् व्यक्ति के पुत्र को ऐसी जगह पर छोड़ दिया जाए, जहाँ शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक वातावरण उपलब्ध न हो, तो उसका अपने पिता की तरह महान् बनना सम्भव नहीं हो सकता।

व्यक्तित्व पर प्रभाव

व्यक्तित्व के निर्माण में वंशानुक्रम की अपेक्षा वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। कोई भी व्यक्ति उपयुक्त वातावरण में रहकर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करके महान् बन सकता है। ऐसे कई उदाहरण हमारे आस-पास देखने को मिलते हैं जिनमें निर्धन परिवारों में जन्मे व्यक्ति भी अपने परिश्रम एवं लगन से श्रेष्ठ सफलताएँ प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं। न्यूमैन, फ्रीमैन और होलजिंगर ने इस बात को साबित करने के लिए 20 जोड़े जुड़वाँ बच्चों को अलग-अलग वातावरण में रखकर उनका अध्ययन किया। उन्होंने एक जोड़े के एक बच्चे को गाँव के फार्म पर और दूसरे को नगर में रखा। बड़े होने पर दोनों बच्चों में पर्याप्त अन्तर पाया गया। फार्म का बच्चा अशिष्ट, चिन्ताग्रस्त और बुद्धिमान था। उसके विपरीत, नगर का बच्चा, शिष्ट, चिन्तामुक्त और अधिक बुद्धिमान था।

मानसिक विकास पर प्रभाव

गोर्डन नामक मनोवैज्ञानिक का मत है कि उचित सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण मिलने पर मानसिक विकास की : गति धीमी हो जाती है। उसने यह बात नदियों के किनारे रहने वाले बच्चों का अध्ययन करके सिद्ध की। इन बच्चों का वातावरण गन्दा और समाज के अच्छे प्रभावों से दूर था। अध्ययन में पाया गया कि गन्दे एवं समाज के अच्छे प्रभावों से दूर रहने के कारण बच्चों के मानसिक विकास पर भी प्रतिकूल असर पड़ता था|

बालक पर बहुमुखी प्रभाव

वातावरण, बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि सभी अंगों पर प्रभाव डालता है। इसकी पुष्टि एवेराम्‍न का जंगली बालक के उदाहरण से की जा सकती है। इस बालक को जन्‍म के बाद एक भेडिया उठा ले गया था और उसका पालन पोषण जंगली पशुओं के बीच में हुआ था। कुछ शिकारियों ने उसे 1799 ई. में पकड़ लिया। उस समय उसकी आयु 11 अथवा 12 वर्ष की थी। उसकी आकृति पशुओं-सी हो गई थी। वह उनके समान ही हाथों-पैरों से चलता था। वह कच्चा माँस खाता था। उसमें मनुष्य के समान बोलने और विचार करने की शक्ति नहीं थी। उसको मनुष्य के समान सभ्य और शिक्षित बनाने के सब प्रयास विफल हुए।

आनुवंशिकता एवं वातावरण के बाल विकास पर भावों के शैक्षिक महत्व

विकास की वर्तमान विचारधारा में प्रकृति और पालन-पोषण दोनों को महत्व दिया गया है। आनुवंशिकता और परिवेश परस्पर इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि इन्हें पृथक् करना असम्भव है और बच्चे पर प्रत्येक परस्पर अपना प्रभाव डालता है। इसलिए व्यक्ति के विकास की कुछ सार्वभौमिक विशेषताएँ होती हैं और कुछ निजी विशेषताएँ होती हैं। 

  • आनुवंशिकता की भूमिका को समझना बहुत महत्वपूर्ण है और इससे भी अधिक लाभकारी है कि हम समझे कि परिवेश में कैसे सुधार किया जा सकता है?
  • ताकि बच्चे की आनुवंशिकता द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर सर्वोत्तम सम्भावित विकास के लिए सहायता की जा सके। हमें साधारणतया यह प्रश्न सुनने को मिलता है कि बालक की शिक्षा और विकास में वंशानुक्रम अधिक महत्वपूर्ण है या वातावरण? 

यह प्रश्न पूछना यह पूछने के समान है कि मोटरकार के लिए इंजन अधिक महत्वपूर्ण है या पेट्रोल। जिस प्रकार मोटरकार के लिए इंजन और पेट्रोल का समान महत्च है, उसी प्रकार बालक के विकास के लिए वंशानुक्रम तथा वातावरण का समान महत्व है। वंशानुक्रम और वातावरण में पारस्परिक निर्भरता है। ये एक-दूसरे के पूरक, सहायक और सहयोगी हैं। बालक को जो मूल प्रवृतियाँ वंशानुक्रम से प्राप्त होती हैं, उनका विकास वातावरण में होता है, उदाहरण के लिए, यदि बालक में बौद्धिक शक्ति नहीं है, तो उत्तम-से-उत्तम वातावरण भी उसका मानसिक विकास नहीं कर सकता है। 

इसी प्रकार बौद्धिक शक्ति वाला बालक प्रतिकूल वातावरण में अपना मानसिक विकास नहीं कर सकता है। वस्तुत: बालक के सम्पूर्ण व्यवहार की सृष्टि, वंशानुक्रम और वातावरण की अन्तःक्रिया द्वारा होती है। शिक्षा की किसी भी योजना में वंशानुक्रम और वातावरण को एक-दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता है। जिस प्रकार आत्मा और शरीर का सम्बन्ध है, उसी प्रकार वंशानुक्रम और वातावरण का भी सम्बन्ध है। अतः बालक के सम्यक् विकास के लिए वंशानुक्रम और वातावरण का संयोग अनिवार्य है।

  • बालक क्या है? वह क्या कर सकता है?
  •  उसका पर्याप्त विकास क्यों नहीं हो रहा है?

 आदि प्रश्नों का उत्तर आनुवंशिकता एवं वातावरण के प्रभावों में निहित है। इनकी जानकारी का प्रयोग कर शिक्षक बालक के सर्वागीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक, सभी प्रकार के विकासों पर आनुवंशिकता एवं वातावरण का प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बालक की शिक्षा भी इससे प्रभावित होती है। अत: बच्चे के बारे में इस प्रकार की जानकारियाँ उसकी समस्याओं के समाधान में शिक्षक की सहायता करती हैं।

बालक को समझकर ही उसे दिशा-निर्देश दिया जा सकता है। एक कक्षा में पढ़ने वाले सभी बालकों का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एक जैसा नहीं होता है। शारीरिक विकास मानसिक विकास से जुड़ा है और जिसका मानसिक विकास अच्छा होता है, उसकी शिक्षा भी अच्छी होती है। वंशानुक्रम से व्यक्ति शरीर का आकार-प्रकार प्राप्त करता है। वातावरण शरीर को पुष्ट करता है। यदि परिवार में पौष्टिक भोजन बच्चे को दिया जाता है, तो उसकी माँसपेशियाँ, हड्डियाँ तथा अन्य प्रकार की शारीरिक क्षमताएँ बढ़ती हैं। बौद्धिक क्षमता के लिए सामान्यतः वंशानुक्रम ही जिम्मेदार होता है। इसलिए बालक को समझने के लिए इन दोनों कारकों को समझना आवश्यक है।

15 June 2021

समाजीकरण की अवधारणा

समाजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो नवजात शिशु को सामाजिक प्राणी बनाती है। इस प्रक्रिया के अभाव में व्यक्ति सामाजिक प्राणी नहीं बन सकता। इसी से सामाजिक व्यक्तित्व का विकास होता है। सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के तत्वों का परिचय भी इसी से प्राप्त होता है। समाजीकरण से न केवल मानव जीवन का प्रभाव अखण्ड तथा सतत रहता है, बल्कि इसी से मानवोचित गुणों का विकास भी होता है और व्यक्ति सुसभ्य व सुसंस्कृत भी बनता है।

संस्कृति का हस्तान्तरण भी समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया के बिना व्यक्ति सामाजिक गुणों को प्राप्त नहीं कर सकता है। अत: यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। समाजीकरण की प्रक्रिया में उन मानकों, मूल्यों और विश्वासों को प्राप्त किया जाता है, जिन्हें समाज में महत्व दिया जाता है। इस तरह यह सांस्कृतिक मूल्यों, प्राथमिकताओं और प्रतिमानों को बच्चों के व्यवहार में संक्रमित करने की प्रक्रिया है। 

सामाजीकरण की अवधारणाएँ


यह विभिन्न प्रक्रियाओं, शैक्षिक संस्थाओं और लोगों द्वारा सम्पन्न होती है। समाजीकरण में बच्चों के व्यवहार को निर्देशित करना और अनैच्छिक एवं गलत व्यावहारिक प्रवृत्तियों को अनुशासित करना, आता है। समाजीकरण के कुछ महत्वपूर्ण अभिकर्ता, माता-पिता, समवयस्क समूह, विद्यालय, धार्मिक संस्थाएँ और जनसंचार माध्यम जैसे-दूरदर्शन इत्यादि। वे प्रत्यक्ष रूप से बच्चों को पालने की प्रक्रिया में प्रभाव डालते हैं साथ-ही-साथ अप्रत्यक्ष रूप से सांस्कृतिक उचित तरीके के विचार और व्यवहार को बल देते हैं।

प्रारम्भिक बाल्यकाल विकास का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण समय है क्योंकि इस समय बच्चे अपने परिवारों, समाज और संस्कृति के रीति-रिवाज और रीतियों के बारे में बहुत कुछ सीखते हैं। वे भाषा ग्रहण करते हैं और संस्कृति के आधारभूत सिद्धान्त सीखते हैं। इस अवस्था में प्राथमिक समाजीकरण के अभिकर्ता परिवार के सदस्य होते हैं। मध्य बाल्यकाल में परिवार महत्वपूर्ण होते हुए भी समवयस्कों एवं विद्यालय का प्रभाव प्रमुख हो जाता है। संचार माध्यमों जैसे दूरदर्शन और कम्प्यूटर का प्रभाव अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।

यही वह समय है जब सामाजिक रूढ़ियाँ और पूर्वाग्रह विकसित होने की अधिक सम्भावना होती है। कई शोध किए गए हैं कि पालने के तरीकों का प्रभाव बच्चे के समाजीकरण पर पड़ता है। परिवार, साथी, संचार माध्यम और विद्यालय के अतिरिक्त भी कुछ दूसरे कारक हैं जो समाजीकरण की प्रक्रिया पर प्रभाव डालते हैं। माता-पिता की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और कुल परम्परा बच्चों के विकास में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से असर डालते हैं। कुल परम्परा (एथनीसिटी) परिवार के आकार, संरचना, शिक्षा, आय, रचना और फैले हुए जाल से जुड़ी होती है।

शैक्षिक समाजशास्त्र के विद्वान् बोगार्डस ने समाजीकरण की परिभाषा इस प्रकार दी है 'समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति सामाजिक कल्याण हेतु एक-दूसरे पर निर्भर रहकर व्यवहार करना सीखते हैं और जिसके द्वारा सामाजिक आत्म-नियन्त्रण, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा सन्तुलित व्यक्तित्व का अनुभव प्राप्त करते हैं"।

समाजीकरण का कार्य समाज में रहकर ही सम्भव है, समाज से अलग रहकर नहीं। यह व्यक्ति को सामाजिक परम्पराओं, प्रथाओं, रूढ़ियों, मूल्यों, आदशाँ आदि का पालन करना और विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में अनुकूलन करना सिखाता है। समाजीकरण द्वारा संस्कृति, सभ्यता और अन्य अनगिनत विशेषताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती हैं और जीवित रहती हैं।

समाजीकरण के कारक

किसी बालक के समाजीकरण  की प्रक्रिया के महत्‍वपर्ण कारक निम्‍न प्रकार से है।

पालन पोषण

बालक के समाजीकरण पर पालन-पोषण का गहरा प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार का वातावरण बालक को प्रारम्भिक जीवन में मिलता है तथा जिस प्रकार से माता-पिता बालक का पालन-पोषण करते हैं उसी के अनुसार बालक में भावनाएँ तथा अनुभूतियाँ विकसित हो जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि जिस बालक की देख-रेख उचित ढंग से नहीं होती उसमें समाज विरोधी आचरण विकसित हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, बालक समाज विरोधी आचरण उसी समय करता है जब वह अपने को समाज के साथ व्यवस्थापित नहीं कर पाता। इस दृष्टि से उचित समाजीकरण के लिए यह आवश्यक है कि बालक का पालन-पोषण ठीक प्रकार से किया जाए।

सहानुभूति

पालन-पोषण की भाँति सहानुभूति का भी बालक के समाजीकरण में गहरा प्रभाव पड़ता है। ध्यान देने की बात यह है कि शैशवावस्था में बालक अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर रहता है। दूसरे शब्दों में, अन्य व्यक्तियों द्वारा बालक की आवश्यकताएँ पूरी की जाती हैं। यहाँ इस बात को ध्यान में रखना आवश्यक है कि बालक की सभी आवश्यकताओं को पूरा करना ही सब कुछ नहीं है वरन् उसके साथ सहानुभूति रखना भी आवश्यक होता है। इसका कारण यह है कि सहानुभूति के द्वारा बालक में अपनत्व की भावना विकसित होती है, जिसके परिणामस्वरूप वह एक-दूसरे में भेदभाव करना सीख जाता है। वह उस व्यक्ति को अधिक प्यार करने लगता है, जिसका व्‍यवहार उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण होता है।

सहकारिता

व्यक्ति को समाज ही सामाजिक बनाता है। दूसरे शब्दों में, समाज की सहकारिता बालक को सामाजिक बनाने में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। जैसे-जैसे बालक अपने साथ अन्य व्यक्तियों का सहयोग पाता जाता है, वैसे-वैसे वह दूसरे लोगों के साथ अपना सहयोग भी प्रदान करना आरम्भ कर देता है। इससे उसकी सामाजिक प्रवृत्तियाँ संगठित हो जाती हैं।

निर्देश

सामाजिक निर्देशों का बालक के समाजीकरण में गहरा हाथ होता है। ध्यान देने की बात यह है कि बालक जिस कार्य को करता है, उसके सम्बन्ध में वह दूसरे व्यक्तियों से निर्देश प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, वह उसी कार्य को करता है, जिसको करने के लिए उसे निर्देश दिया जाता है। इस प्रकार, हम देखते हैं कि निर्देश सामाजिक व्यवहार की दिशा को निर्धारित करता है।

आत्‍मीकरण

माता-पिता, परिवार तथा पड़ोस की सहानुभूति द्वारा बालक में आत्मीकरण की भावना का विकास होता है। जो लोग बालक के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करते हैं, उन्हीं को बालक अपना समझने लगता है तथा उन्हीं के रहन- सहन, भाषा तथा आदशों के अनुसार व्यवहार करने लगता है।

अनुकरण

समाजीकरण का आधारभूत तत्व अनुकरण है। ध्यान देने की बात यह है कि बालक में अनुकरण का विकास परिवार तथा पड़ोस में रहते हुए होता है। दूसरे शब्दों में, बालक परिवार तथा पड़ोस के लोगों को जिस प्रकार का व्यवहार करते हुए देखता है, वह उसी प्रकार का अनुकरण करने लगता है।

सामाजिक शिक्षण

अनुकरण के अतिरिक्त सामाजिक शिक्षण का भी बालक के समाजीकरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ध्यान देने की बात यह है कि सामाजिक शिक्षण का आरम्भ परिवार से होता है जहाँ पर बालक माता-पिता, भाई-बहन तथा अन्य सदस्यों से खान-पान तथा रहन-सहन आदि के बारे में शिक्षा ग्रहण करता रहता है।

पुरस्‍कार एवं दण्‍ड

बालक के समाजीकरण में पुरस्कार एवं दण्ड का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। जब बालक समाज के आदशों तथा मान्यताओं के अनुसार व्यवहार करता है तो लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। साथ ही वह समाज के हित की दृष्टि में रखते हुए जब कोई विशिष्ट व्यवहार करता है, तो उसे पुरस्कार भी मिलता है। इसके विपरीत जब बालक असामाजिक व्यवहार करता है, तो दण्ड दिया जाता है जिसके भय से वह ऐसा कार्य फिर दोबारा नहीं करता। स्पष्ट है, पुरस्कार एवं दण्ड का बालक के समाजीकरण पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

बालकों का समाजीकरण करने वाले तत्व

बालक जन्म के समय कोरा पशु होता है। जैसे-जैसे वह समाज के अन्य व्यक्तियों तथा सामाजिक संस्थाओं के सम्पर्क में आकर विभिन्न प्रकार की सामाजिक क्रियाओं में भाग लेता रहता है, वैसे-वैसे वह अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण करते हुए सामाजिक आदशों तथा मूल्यों को सीखता रहता है। इस प्रकार, बालक के समाजीकरण की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।

बालक के समाजीकरण में उसका परिवार, पड़ोस, स्कूल, उसके साथी, उसका समुदाय, धर्म, इत्यादि कारकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

वंशानुक्रम

बालक में वंशानुक्रम से प्राप्त कुछ आनुवंशिक गुण होते हैं, जैसे- मूलभाव, संवेग, सहज क्रियाएँ व क्षमताएँ आदि। इनके अतिरिक्त उनके अनुकरण एवं सहानुभूति जैसे गुणों में भी वंशानुक्रम की प्रमुख भूमिका होती है। ये सभी तत्व बालक के समाजीकरण के लिए उत्तरदायी होते हैं।

परिवार

बालक के समाजीकरण के विभिन्न तत्वों में परिवार का प्रमुख स्थान है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक बालक का जन्म किसी-न-किसी परिवार में ही होता है। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है वैसे-वैसे वह अपने माता-पिता, भाई-बहनों तथा परिवार के अन्य सदस्यों के सम्पर्क में आते हुए प्रेम, सहानुभूति, सहनशीलता तथा सहयोग आदि अनेक सामाजिक गुणों को सीखता रहता है। यही नहीं, वह अपने परिवार में रहते हुए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने परिवार के आदर्शी, मूल्यों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं तथा मान्यताओं एवं विश्वासों को भी धीरे-धीरे सीख जाता है।

पड़ोस

पड़ोस भी एक प्रकार का बड़ा परिवार होता है। जिस प्रकार, बालक परिवार के विभिन्न सदस्यों के साथ अन्तःक्रिया द्वारा अपनी संस्कृति एवं सामाजिक गुणों का ज्ञान प्राप्त करता है, ठीक उसी प्रकार वह पड़ोस में रहने वाले विभिन्न सदस्यों एवं बालकों के सम्पर्क में रहते हुए विभिन्न सामाजिक बातों का ज्ञान प्राप्त करता रहता है। इस दृष्टि से यदि पड़ोस अच्छा है, तो उसका बालक के व्यक्तित्व के विकास पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा और यदि पड़ोस खराब है, तो बालक के बिगड़ने की सम्भावना है। यही कारण है कि अच्छे परिवारों के लोग अच्छे पड़ोस में ही रहना पसन्द करते हैं।

स्‍कूल

परिवार तथा पड़ोस के बाद स्कूल एक ऐसा स्थान है जहाँ पर बालक का समाजीकरण होता है। स्कूल में विभिन्न परिवारों के बालक शिक्षा प्राप्त करने आते हैं। बालक इन विभिन्न परिवारों के बालक तथा शिक्षकों के बीच रहते हुए सामाजिक प्रतिक्रिया करता  है जिससे उसका समाजीकरण तीव्रगति से होने लगता है। स्कूल में रहते हुए बालक को जहाँ एक ओर विभिन्न विषयों की प्रत्यक्ष शिक्षा द्वारा सामाजिक नियमों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं, मान्यताओं, विश्वासों तथा आदशों एवं मूल्यों का ज्ञान होता है वहीं दूसरी ओर उसमें स्कूल की विभिन्न सामाजिक योजनाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न सामाजिक गुणों का विकास होता रहता है। इस दृष्टि से परिवार तथा पड़ोस की भाँति स्कूल भी बालक के समाजीकरण का मुख्य साधन है।

बालक के साथी

प्रत्येक बालक अपने साथियों के साथ खेलता है। वह खेलते समय जाति-पाँति, ऊँच-नीच तथा अन्य प्रकार के भेद भावों से ऊपर उठकर दूसरे बालकों के साथ अन्तःक्रिया द्वारा आनन्द लेना चाहता है। इस कार्य में उसके साथी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

समुदाय

बालक के समाजीकरण में समुदाय अथवा समाज का गहरा प्रभाव होता है। प्रत्येक समाज अथवा समुदाय अपने-अपने विभिन्न साधनों तथा विधियों के द्वारा बालक का समाजीकरण करना अपना परम कर्तव्य समझता है। इन साधनों के अन्तर्गत जातीय तथा राष्ट्रीय प्रथाएँ एवं परम्पराएँ मनोरंजन एवं पूर्वधारणाएँ इत्यादि आती हैं।

धर्म

धर्म का बालक के समाजीकरण में महत्वपूर्ण योगदान है। हम देखते हैं कि प्रत्येक धर्म के कुछ संस्कार, परम्पराएँ, आदर्श तथा मूल्य होते हैं। जैसे-जैसे बालक अपने धर्म अथवा अन्य धर्मों के व्यक्तित्व एवं समूहों के सम्पर्क में आता जाता है, वैसे-वैसे वह उक्त सभी बातों को स्वाभाविक रूप से सीखता है।

समाजीकरण में अध्‍यापक की भूमिका

  1. विद्यालय न केवल शिक्षा का एक औपचारिक साधन है, बल्कि यह बच्चे के समाजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान करता है और विद्यालय के इस । कार्य में शिक्षक की भूमिका सर्वाधिक अहम होती है।
  2. परिवार के बाद बच्चों को विद्यालय में प्रवेश मिलता है। अध्यापक ही शिक्षा के द्वारा बच्चे में वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्य पैदा करता है, जो समाज  व संस्कृति में मान्य होते हैं।
  3. स्कूल में खेल प्रक्रिया द्वारा बच्चे सहयोग, अनुशासन, सामूहिक कार्य आदि सीखते हैं। इस प्रकार, विद्यालय बच्चे में आधारभूत सामाजिक व्यवहार तथा  व्यवहार के सिद्धान्तों की नींव डालता है।
  4. समाजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान करने के लिए शिक्षक का सर्वप्रथम कार्य यह है कि वह बालक के माता-पिता से सम्पर्क स्थापित करके उसकी रुचियों तथा मनोवृत्तियों के विषय में ज्ञान प्राप्त करे एवं उन्हीं के अनुसार उसे विकसित होने के अवसर प्रदान करे।
  5. शिक्षक को चाहिए कि वह स्कूल में विभिन्न सामाजिक योजनाओं के द्वारा बालकों को सामूहिक क्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसर प्रदान  करे। इन क्रियाओं में भाग लेने से उसका समाजीकरण स्वत: हो जाएगा।
  6. बालक के समाजीकरण में स्वस्थ मानवीय सम्बन्धों का गहरा प्रभाव पड़ता है। अत: शिक्षक को चाहिए कि वह दूसरे बालकों, शिक्षकों तथा स्कूल के प्रधानाचार्य के साथ स्वस्थ मानवीय सम्बन्ध स्थापित करे। इन स्वस्थ मानवीय सम्बन्धों के स्थापित हो जाने से स्कूल का समस्त वातावरण सामाजिक बन जाएगा
  7. बच्चे को सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताओं, मूल्यों, मानकों आदि का ज्ञान देना उनके समाजीकरण को तीव्र करने में सहायक सिद्ध होता है। जहाँ तक सामाजिक भूमिका की प्रत्याशा एवं उनके निर्वाह का प्रश्न है, तो अध्यापक स्वयं अपना उदाहरण प्रस्तुत कर उन्हें अनुकरण हेतु प्रेरित कर सकता है।
  8. विद्यार्थियों से घनिष्ठ व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित कर उन्हें अपनी अभिवृत्तियों की समीक्षा करने हेतु प्रोत्साहित कर तथा उनकी वर्तमान अभिवृत्तियों का समर्थन कर उनके समाजीकरण में सहायता की जा सकती है। समाजीकरण के मामले में बच्चे अपने अभिभावकों एवं शिक्षकों का ही अनुकरण करते हैं।

बच्चे के समाजीकरण में परिवार एवं माता-पिता की भूमिका

समाजीकरण करने वाली संस्था के रूप में परिवार व माता-पिता का असाधारण महत्व है। यह कहा जाता है कि माँ के त्याग और पिता की सुरक्षा में रहते हुए बच्चा जो कुछ सीखता है, वह उसके जीवन की स्थायी पूँजी होती है। बच्चा सबसे पहले परिवार में जन्म लेकर परिवार का सदस्य बनता है। उसका सबसे घनिष्ठ सम्बन्ध अपनी माँ से होता है। माँ उसे दूध पिलाती है और तरह-तरह से उसकी रक्षा करती है।

बच्चे को नियमित रूप से खाने-पीने की, पहनने की तथा रहने की सीख उसे माँ से मिलती है। इससे बच्चे के मन में एक सुरक्षा की भावना पनपती है जो उसके जीवन को स्थिर तथा दृढ़ बनाती है और आगे चलकर उसे उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायता देती है। माता और पिता से बच्चे की अधिकतर आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। साथ ही बच्चा यह देखता है कि कुछ कार्यों को करने पर माता या पिता उसे प्यार करते हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं और कुछ कार्यों के करने से उसे दण्ड मिलता है व उसकी निन्दा होती है। परिवार में ही बच्चे को सर्वप्रथम यह ज्ञान होता है कि उसे कौन-कौन से काम करने चाहिएँ और किन-किन कार्यों से बचना चाहिए? इससे बच्चा धीरे-धीरे यह सीख जाता है कि समाज में क्या अच्छा है और क्या बुरा और समाज उससे क्या चाहता है? जो समाज में प्रचलित होते हैं तथा समाज को मान्य होते हैं।

माँ अपने बच्चे को प्यार करती है, परिवार के अन्य लोग भी उसे प्यार करते हैं। वे उसके साथ हँसते-बोलते हैं। बच्चा उनकी ओर देखता है, उनके होंठों को हिलाकर बातें करने की प्रक्रिया को बार-बार देखता और फिर उसी की नकल उतारने का प्रयास करता है। इसी के परिणामस्वरूप समाजीकरण के एक महत्वपूर्ण पक्ष भाषा का विकास उसमें होता है।  परिवार में प्राय: एक से अधिक सदस्य होते हैं। इनमें से प्रत्येक के अलग-अलग मिजाज, रुचि, व्यवहार के तरीके, भावनाएँ आदि होती हैं फिर भी इनमें से प्रत्येक के साथ बच्चे को घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना होता है, क्योंकि परिवार के एक छोटे-से दायरे के साथ किस प्रकार मिलकर रहा जाता है, दूसरों से किस प्रकार अनुकूलन किया जाता है? 

इस अनुकूलन के दौरान उसमें सहनशीलता का गुण भी पनप जाता है। परिवार एवं समाज में अनुकूलित होने की प्रक्रिया को समायोजन कहते हैं, जो समाजीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। समायोजन को ही कुछ समाजशास्त्री समाजीकरण कहते हैं। परिवार में रहकर बच्चा माँ-बाप से सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ, क्षमा का महत्व और सहयोग की आवश्यकता सीखता है तथा अपनी मौलिक धारणाओं, आदर्श एवं शैली की रचना करता है। यदि परिवार में परस्पर सहयोग की भावना हो, तो बालक में भी सहयोग की भावना का विकास होता है। बच्चे की यह भावना उसके बाह्य समाज से व्यवहार में भी झलकती है। माँ-बाप की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं परिवार के आर्थिक स्तर का भी बच्चे के समाजीकरण पर प्रभाव पड़ता है।

14 June 2021

विकास की अवस्‍थाओं के सिद्धांत

मानव विकास की वृद्धि एवं विकास के कई आयाम होते हैं।

विकास की विभिन्न अवस्था में बालक में विशेष प्रकार के गुण एवं विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। इनका अध्ययन कर कई मनोवैज्ञानिकों ने विकास की अवस्थाओं के सन्दर्भ में विभिन्न प्रकार के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है।

विकास की अवस्थाओं से सम्बन्धित सिद्धान्तों में जीन पियाजे, लॉरेन्स कोह्नबर्ग एवं वाइगोत्स्की नामक मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रदत्त सिद्धान्त विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

विकास की अवस्‍थाओं के सिद्धांत


जीन पियाजे के संज्ञानात्‍मक विकास का सिद्धान्‍त

जीन पियाजे स्विट्जरलैण्ड के एक मनोवैज्ञानिक थे। बालकों में बुद्धि का विकास किस ढंग से होता है, यह जानने के लिए उन्होंने अपने स्वयं के बच्चों को अपनी खोज का विषय बनाया। बचे जैसे-जैसे बड़े होते गए, उनके मानसिक विकास सम्बन्धी क्रियाओं का वे बड़ी बारीकी से अध्ययन करते रहे। इस अध्ययन के परिणामस्वरूप उन्होंने जिन विचारों का प्रति दून किया उन्हें पियाजे के मानसिक या संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है।

  • संज्ञानात्मक विकास का तात्पर्य बच्चों के सीखने और सूचनाएँ एकत्रित करने के तरीके से है। इसमें अवधान में वृद्धि प्रत्यक्षीकरण, भाषा, चिन्तन, स्मरण शक्ति और तर्क शामिल हैं।
  • पियाजे के संज्ञानात्मक सिद्धान्त के अनुसार, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा संज्ञानात्मक संरचना को संशोधित किया जाता है, समावेशन कहलाती है।
  • पियाजे ने अपने इस सिद्धान्त के अन्तर्गत यह बात सामने रखी कि बच्चों में बुद्धि का विकास उनके जन्म के साथ जुड़ा हुआ है। प्रत्येक बालक अपने जन्म के समय कुछ जन्मजात प्रवृत्तियों एवं सहज क्रियाओं को करने सम्बन्धी योग्यताओं जैसे चूसना, देखना, वस्तुओं को पकड़ना, वस्तुओं तक पहुँचना आदि को लेकर पैदा होता है। अत: जन्म ' के समय बालक के पास बौद्धिक संरचना के रूप में इसी प्रकार की क्रियाओं को करने की क्षमता होती है, परन्तु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है उन बौद्धिक क्रियाओं का दायरा बढ़ जाता है और वह बुद्धिमान बनता चला जाता है।
  • पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के अनुसार हमारे विचार और तर्क अनुकूलन के भाग हैं। संज्ञानात्मक विकास एक निश्चित अवस्थाओं के क्रम में होता है। पियाजे ने बालकों में बुद्धि का इस प्रकार क्रमिक विकास अर्थात् संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है, जिनके नाम एवं विशेषताएँ नीचे की सारणी में दी गई हैं

(1) इन्द्रियजनित गामकं अवस्था (जन्म से 2 वर्ष तक)

  • मानसिक क्रियाएँ इन्द्रियजनित गामक क्रियाओं के रूप में ही सम्पन्न होती हैं।
  • भूख लगने की स्थिति को बालक रोकर व्यक्त करता है।
  • जिन वस्तुओं को वे प्रत्यक्षत: देखते हैं, उनके लिए उसी का अस्तित्व होता है।
  • इस आयु में बालक की बुद्धि उसके कार्यों द्वारा व्यक्त होती है। उदाहरण के लिए, चादर पर बैठा शिशु चादर पर थोड़ी दूर स्थित खिलौने को प्राप्त करने के लिए चादर को खींचकर खिलौना प्राप्त कर लेता है।
  • इस तरह यह अवस्था अनुकरण, स्मृति और मानसिक निरूपण से सम्बन्धित है।

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2 से 7 वर्ष तक)

  • इस अवस्था में बालक अपने परिवेश की वस्तुओं को पहचानने एवं उसमें विभेद करने लगता है।
  • इस दौरान उसमें भाषा का विकास भी प्रारम्भ हो जाता है।
  • इस अवस्था में बालक नई सूचनाओं और अनुभवों का संग्रह करता है। वह पहली अवस्था की अपेक्षा अधिक समस्याओं का समाधान करने योग्य हो जाता है।

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7 से 11 वर्ष तक)

  • इस अवस्था में बालक में वस्तुओं को पहचानने, उनका विभेदीकरण करने तथा वर्गीकरण     
  • करने की क्षमता विकसित हो जाती है।
  • उनका चिन्तन अब अधिक क्रमबद्ध एवं तर्कसंगत होना प्रारम्भ कर देता है।
  • इस अवस्था में बालक यह विश्वास करने लगता है कि लम्बाई, भार, अंक आदि स्थिर रहते हैं।
  • बालक किसी पूर्व और उसके अंश के सम्बन्ध में तर्क कर सकता है।
  • बालक अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने के लिए अनेक नियमों को सीख लेता है।

(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष से आगे)

  • यह अवस्था ग्यारह वर्ष से प्रौढ़ावस्था तक की अवस्था है।
  • अमूर्त चिन्तन इस अवस्था की प्रमुख विशेषता है।
  • इस अवस्था में भाषा सम्बन्धी योग्यता तथा सम्प्रेषणशीलता का विकास अपनी ऊँचाई को छूने लगता है।
  • बालक में अच्‍छी तरह से सोचने, समस्‍या समाधान करने एवं निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो जाता है।

जीन पियाजे के अन्‍य सिद्धान्‍त

निर्माण और खोज का सिद्धान्त

प्रत्येक बालक अपने अनुभवों को अर्थपूर्ण बनाने के लिए क्रियाशील होता है। वह यह जानने के लिए प्रयत्नशील होता है कि उसके विचार सम्बद्धतापूर्वक मेल खाते हैं या नहीं। बच्चे उन व्यवहारों और विचारों की समय-समय पर खोज और निर्माण करते हैं, जिन व्यवहारों और विचारों का उन्होंने कभी पहले प्रत्यक्ष नहीं किया होता है।

पियाजे का विचार है कि ज्ञानात्मक विकास केवल नकल न होकर खोज पर आधारित है। नवीनता या खोज को उद्दीपक-अनुक्रिया सामान्यीकरण के आधार पर नहीं समझाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक चार साल का बालक यदि भिन्न-भिन्न आकार के प्यालों को प्रथम बार क्रमानुसार लगा देता है, तो यह उसके बौद्धिक वृद्धि की खोज और निर्माण से सम्बन्धित है।

कार्य-क्रिया का अर्जन

कार्यात्मक क्रिया का तात्पर्य उस विशिष्ट प्रकार की मानसिक दिनचर्या से है, जिसकी मुख्य विशेषता उत्क्रणशीलता है।

  • प्रत्येक कार्यात्मक-क्रिया का एक तर्कपूर्ण विपरीत होता है। उदाहरण के लिए, एक मिट्टी के चक्र को दो भागों में तोड़ना तथा दो टूटे हुए भागों को पुनः एक पूर्ण चक्र के रूप में जोड़ना एक कार्यात्मक-क्रिया है। कार्यात्मक-क्रिया की सहायता से बच्चे मानसिक रूप से वहाँ पुन: पहुँच सकते हैं जहाँ से उन्होंने कार्य प्रारम्भ किया था।
  • बौद्धिक वृद्धि का केन्द्र इन्हीं कार्यात्मक-क्रिया का अर्जन है।
  • पियाजे का विचार है कि जब तक बालक किशोर अवस्था तक नहीं पहुँच जाता है तब तक वह भिन्न-भिन्न विकास अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न वर्गों के कार्यात्मक-क्रिया का अर्जन करता रहता है।  
  • एक विकास अवस्था से दूसरी में पदार्पण के लिए दो तथ्य आवश्यक हैं - सात्मीकरण एवं सन्तुलन स्थापित करना।
  • सात्मीकरण का अर्थ है बालक में उपस्थित एक विचार में किसी नये विचार या वस्तु का समावेश हो जाना। पियाजे के अनुसार, सात्मीकरण बालक के प्रत्यक्षात्मक-गत्यात्मक समन्वय से सम्बन्धित है।
  • व्यवस्थापन या सन्तुलन का अर्थ है नई वस्तु या विचार के साथ समायोजन करना या अपने विचारों और क्रियाओं को नये विचारों और वस्तुओं में फिट करना।

लॉरेन्‍स कोहलबर्ग का नैतिक विकास की अवस्‍था का सिद्धान्‍त

बालकों में चरित्र निर्माण या नैतिक विकास के सन्दर्भ में लॉरेन्स कोह्नबर्ग ने अपने अनुसन्धानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि बालकों में नैतिकता या चरित्र के विकास की कुल निश्चित एवं सार्वभौमिक स्तर अथवा अवस्थाएँ पाई जाती हैं।

ये अवस्थाएँ या स्तर इस प्रकार हैं ।

  • पूर्व नैतिक स्तर
  • परम्परागत नैतिक स्तर
  • आत्म अंगीकृत नैतिक मूल्य स्तर

पूर्व नैतिक अवस्था या स्तर बालक 4 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक, परम्परागत नैतिक अवस्था या स्तर 10 तथा 13 वर्ष के दौरान एवं आत्म अंगीकृत नैतिक स्तर या अवस्था 13 वर्ष से प्रारम्भ होकर प्रौढ़ावस्था तक चलती है।

कोहलवर्ग द्वारा प्रदत्‍त इस प्रकार के वर्गीकरण को कुछ और आगे बढ़ाने का प्रयत्‍न किया जाए, तो निम्‍न प्रकार के वर्गीकरण द्वारा बालकों के नैतिक या चारित्रिक विकास की पाँच प्रमुख स्‍तर या अवस्‍थाऍ तय की जा सकती है।  

पूर्व नैतिक अवस्था, स्वकेन्द्रित अवस्था, परम्पराओं को धारण करने वाली अवस्था, आधारहीन आत्मचेतना अवस्था एवं आधारयुक्त आत्मचेतना अवस्था।

पूर्व नैतिक

यह अवस्था जन्म से लेकर दो वर्ष की आयु तक विद्यमान रहती है।

इस अवस्था में बालक से किसी प्रकार की नैतिकता या चारित्रिक मूल्यों को धारण करने की बात ही नहीं उठती है, क्योंकि इस स्तर पर उसे यह समझ नहीं होती कि उसके ऐसा करने से किसी अन्य को नुकसान या परेशानी होगी।

क्या अच्छा है क्या बुरा, यह बात उसकी समझ से बाहर ही होती है। उसे अपनी इच्छाओं, भावनाओं तथा संवेगों पर नियन्त्रण करना नहीं आता और परिणामस्वरूप वह अपनी मर्जी का मालिक बनकर इच्छित व्यवहार करने की जिद पकड़ता रहता है।

कोहलबर्ग के अनुसार नैतिक विकास के चरण   

  1. आत्‍मकेन्द्रित निर्णय (वैयक्तिकता ओर विनियम)
  2. यान्त्रिक सापेक्षिक उन्मुखीकरण
  3. परस्पर एकरूप उन्मुखीकरण (अच्छे अन्त:वैयक्तिक सम्बन्ध)
  4. अधिकार संरक्षण उन्मुखीकरण
  5. सामाजिक अनुबन्ध एवं व्यक्तिगत अधिकार उन्मुखीकरण
  6. सार्वभौमिक नैतिक सिद्धान्त उन्मुखीकरण ।

स्‍वकेन्द्रित अवस्‍था

  • इस अवस्था का कार्यकाल तीसरे वर्ष से शुरू होकर 6 वर्ष तक होता है।
  • इस अवस्था के बालक की सभी व्यावहारिक क्रियाएँ अपनी वैयक्तिक आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति के चारों ओर केन्द्रित रहती हैं।
  • बालक के लिए वही नैतिक होता है जो उसके स्व यानी आत्म-कल्याण से जुड़ा होता है।
  • परम्पराओं को धारण करने वाली अवस्था
  • सातवें वर्ष से लेकर किशोरावस्था के प्रारम्भिक काल का सम्बन्ध इस अवस्था से है।
  • इस अवस्था का बालक सामाजिकता के गुणों को धारण करता हुआ देखा जाता है अत: उसमें समाज के बनाए नियमों, परम्पराओं तथा मूल्यों को धारण करने सम्बन्धी नैतिकता का विकास होता हुआ देखा जा सकता है।
  • इस अवस्था में उसे अच्छाई-बुराई का ज्ञान हो जाता है और वह यह समझने लगता है कि उसके किस प्रकार के आचरण या व्यवहार से दूसरों का अहित होगा या ठेस पहुँचेगी।

आधारहीन आत्‍मचेतना अवस्‍था

  • यह अवस्था किशोरावस्था से जुड़ी हुई है।
  • इस अवस्था में बालकों का सामाजिक, शारीरिक तथा मानसिक विकास अपनी ऊँचाइयों को छूने लगता है और उसमें आत्मचेतना का प्रादुर्भाव हो जाता है।
  • यह मेरा आचरण है, मैं ऐसे व्यवहार करता हूँ इसकी उसे अनुभूति होने लगती है तथा अपने व्यवहार आचरण और व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों की स्वयं ही आलोचना करने की प्रवृत्ति उसमें पनपने लगती है।
  • पूर्णता की चाह उसमें स्वयं से असन्तुष्ट रहने का मार्ग प्रशस्त कर देती है। यही असन्तुष्टि उसे समाज तथा परिवेश में जो कुछ गलत हो रहा है, उसे बदल डालने या परम्पराओं के प्रति विद्रोही रुख अपनाने को उकसाती है।

आधारयुक्‍त आत्‍मचेतना अवस्‍था

नैतिक या चारित्रिक विकास की यह चरम अवस्था है। भली-भाँति परिपक्वता ग्रहण करने के बाद ही इस प्रकार का विकास सम्भव है।

अब यहाँ जिस प्रकार के नैतिक आचरण और चारित्रिक मूल्यों की बात व्यक्ति विशेष में की जाती है उसके पीछे केवल उसकी भावनाओं का प्रवाह मात्र ही नहीं होता बल्कि वह अपनी मानसिक शक्तियों का उचित प्रयोग करता हुआ अच्छी तरह सोच-समझकर किसी व्यवहार या आचरण विशेष को अपने व्यक्तित्व गुणों में धारण करता हुआ पाया जाता है।

वाइगोत्‍स्‍की के सामाजिक विकास का सिद्धान्‍त

सोवियत रूस के मनोवैज्ञानिक लेव वाइगोत्स्की ने बालकों में सामाजिक विकास से सम्बन्धित एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त में उन्होंने बताया कि बालक में हर प्रकार के विकास में उसके समाज का विशेष योगदान होता है। वाइगोत्स्की ने बताया कि समाज से अन्त:क्रिया के फलस्वरूप ही उसमें विभिन्न प्रकार का विकास होता है। समाज में उसे जिस प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध होंगी, उसका विकास भी उसी प्रकार का होगा। 

यदि उसे सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होंगी, तो इसका उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जन्म के समय शिशु का व्यवहार सामाजिकता से काफी दूर होता है। वह अत्यधिक स्वार्थी होता है। उसे केवल अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने की ललक होती है तथा दूसरों के हित चिन्तन की वह कुछ भी परवाह नहीं करता। वह इस आयु में गुड्डे-गुड़ियों, खिलौने, मूर्ति, आदि निर्जीव पदार्थों तथा पशु-पक्षी, मनुष्य आदि सजीव प्राणियों में कोई अन्तर नहीं समझ पाता। शिशु के सामाजिक सम्पर्क का दायरा बहुत ही सीमित होता है। 

अत: सामाजिक विकास के दृष्टिकोण से उनसे बहुत आशा नहीं की जा सकती। बाल्यावस्था में प्रवेश करने के साथ-साथ अधिकांश बच्चे विद्यालय में जाना प्रारम्भ कर देते हैं और अब उनका सामाजिक दायरा बहुत विस्तृत बनता चला जाता है। बाल्यावस्था के बाद किशोरावस्था में लिंग सम्बन्धी चेतना तीव्र हो जाती है। इस आयु में अधिकतर किशोर और किशोरियाँ अपने वय-समूह के सक्रिय सदस्य होते हैं। समूह के प्रति उत्पन्न भावना अब केवल टोली या गिरोह विशेष तक ही सीमित है। सहानुभूति, सहयोग, सद्भावना, परोपकार और त्याग का अद्भुत सामंजस्य इस अवस्था में देखने को मिलता है। 

किशोरावस्था संवेगों की तीव्र अभिव्यक्ति की अवस्था भी है। इस अवस्था में विशिष्ट रुचियों और सामाजिक सम्पर्क का क्षेत्र भी अत्यधिक विस्तृत होता है। किशोरावस्था में वैयक्तिक विशेषताओं के अतिरिक्त संस्कृति, परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति, यौन सम्बन्धी स्वतन्त्रता और जानकारी इत्यादि उनकी सामाजिक रुचियों और सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करती है। वाइगोत्स्की के सामाजिक विकास के सिद्धान्त का निहितार्थ है सहयोगात्मक समस्या-समाधान, अर्थात् बच्चे अपने शिक्षक के निर्देशानुसार अपने साथियों की सहायता से उन समस्याओं का समाधान कर पाते हैं, जिन्हें उन्होंने पहले अपनी कक्षा में देखा है। 

इसमें वे अपने साथियों के साथ अन्त:क्रिया करते हैं एवं अपने निर्णय पर पहुँचते हैं, शिक्षक का इस कार्य में केवल निर्देश प्राप्त होता है, वह कक्षा पर कठोरता से नियन्त्रण नहीं रखता बल्कि बच्चों को स्वतन्त्रतापूर्वक सोचने एवं समस्या का समाधान करने का अवसर प्रदान करता है। शिक्षक का रवैया केवल सहयोगात्मक एवं निर्देशात्मक होता है।


13 June 2021

बाल केन्द्रित शिक्षा ( Child Centered Education )

प्राचीनकाल में शिक्षा का उद्देश्य बालकों के मस्तिष्क में मात्र कुछ जानकारियाँ भरना होता था, किन्तु आधुनिक शिक्षा शास्त्र में बालकों के सर्वागीण विकास पर जोर दिया जाता है, जिसके लिए बाल मनोविज्ञान की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है।

वर्तमान समय में बालकों के सर्वागीण विकास के महत्व को समझते हुए शिक्षकों के लिए बाल मनोविज्ञान की पर्याप्त जानकारी आवश्यक होती है। इस जानकारी के अभाव में शिक्षक न तो शिक्षा को अधिक-से-अधिक आकर्षक और सुगम बना सकता है और न ही वह बालकों की विभिन्न प्रकार की समस्याओं का समाधान कर सकता है। इस प्रकार बालकों के मनोविज्ञान को समझते हुए उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था करने की आधुनिक शिक्षा प्रणाली बाल-केन्द्रित शिक्षा कहलाती है।

बाल केन्द्रित शिक्षा


भारतीय शिक्षाविद् गिजू भाई की बाल-केन्द्रित शिक्षा के क्षेत्र में विशेष एवं उल्लेखनीय भूमिका रही है। बाल-केन्द्रित शिक्षा के बारे में समझाने एवं इसे क्रियान्वित रूप देने के लिए उन्होंने इससे सम्बन्धित कई प्रकार की पुस्तकों की रचना की तथा कुछ पत्रिकाओं का भी प्रकाशन किया। उनका साहित्य बाल-मनोविज्ञान, शिक्षा शास्त्र एवं किशोर-साहित्य से सम्बन्धित है। आज की शिक्षा पद्धति बाल-केन्द्रित है। इसमें प्रत्येक बालक की ओर अलग से ध्यान दिया जाता है पिछड़े हुए और मन्दबुद्धि तथा प्रतिभाशाली बालकों के लिए शिक्षा का विशेष पाठ्यक्रम देने का प्रयास किया जाता है।

व्यावहारिक मनोविज्ञान ने व्यक्तियों की परस्पर विभिन्नताओं पर प्रकाश डाला है, जिससे यह सम्भव हो सका है कि शिक्षक हर एक विद्यार्थी की विशेषताओं पर ध्यान दें और उसके लिए प्रबन्ध करें।

आज के शिक्षक को केवल शिक्षा एवं शिक्षा पद्धति के बारे में नहीं, बल्कि शिक्षार्थी के बारे में भी जानना होता है, क्योंकि आधुनिक शिक्षा विषय प्रधान या अध्यापक प्रधान न होकर बाल-केन्द्रित है। इसमें इस बात का महत्व नहीं कि शिक्षक कितना ज्ञानी, आकर्षक और गुणयुक्त है, बल्कि इस बात का महत्व है कि वह बालक के व्यक्तित्व का कहाँ तक विकास कर पाता है।

बाल-केन्द्रित शिक्षा की विशेषताएँ

किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए शिक्षक को बालकों के मनोविज्ञान की जानकारी अवश्य होनी चाहिए। इसके अभाव में वह बालकों की न तो विभिन्न प्रकार की समस्याओं को समझ सकता है और न ही उनकी विशेषताओं को, जिसके परिणामस्वरूप बालकों पर शिक्षक के विभिन्न प्रकार के व्यवहारों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

बालक के सम्बन्ध में शिक्षक को उसके व्यवहार के मूल आधारों, आवश्यकताओं, मानसिक स्तर, रुचियों, योग्यताओं, व्यक्तित्व इत्यादि का विस्तुत ज्ञान होना चाहिए। व्यवहार के मूल आधारों का ज्ञान तो सबसे अधिक आवश्यक है, क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य ही बालक के व्यवहार को परिमार्जित करना है। अत: शिक्षा बालक की मूल प्रवृत्तियों, प्रेरणाओं और संवेगों पर आधारित होनी चाहिए। व्यवहार के इन मूल आधारों को नई दिशा में मोड़ा जा सकता है, इनका शोधन किया जा सकता है, इनको बालक में से निकाला जा सकता है। इसलिए सफल शिक्षक इनके शोधीकरण का प्रयास करता है।

बालक जो कुछ सीखता है, उससे उसकी आवश्यकताओं का बड़ा निकट सम्बन्ध है। स्कूल में पिछड़े हुए और समस्याग्रस्त बालकों में से अधिकतर ऐसे होते हैं, जिनकी आवश्यकताएँ स्कूल में पूरी नहीं होती। इसलिए वे सड़कों पर लगे बिजली के बल्बों को फोड़ते हैं, स्कूल से भाग जाते हैं, आवारागदीं करते हैं और आस-पड़ोस के लोगों को तंग करते तथा मोहल्ले के बच्चों को पीटते हैं। मनोविज्ञान के ज्ञान के अभाव में शिक्षक मारपीट के द्वारा इन दोषों को दूर करने का प्रयास करता है, परन्तु बालकों को समझने वाला शिक्षक यह जानता है कि इन दोषों का मूल उनकी शारीरिक, सामाजिक अथवा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं में ही कहीं-न-कहीं है।

बाल मनोविज्ञान शिक्षक को बालकों के व्यक्तिगत भेदों से परिचित कराता है और यह बतलाता है कि उनमें रुचि, स्वभाव तथा बुद्धि आदि की दृष्टि से भिन्नता पाई जाती है। अत: कुशल शिक्षक मन्दबुद्धि, सामान्य बुद्धि तथा कुशाग्र बुद्धि बालकों में भेद करके उन्हें उनकी योग्यताओं के अनुसार शिक्षा देता है। शिक्षा देने में शिक्षक को बालक और समाज की आवश्यकताओं में समन्वय करना होता है। स्पष्ट है कि इसके लिए उसे बालक की पूर्ण मनोवैज्ञानिक जानकारी होनी चाहिए।

शिक्षण विधि (Teaching Method)

  1. शिक्षा शास्त्र शिक्षक को यह बतलाता है कि बालकों को क्या पढ़ाया जाए? 
  2. परन्तु असली समस्या यह कि कैसे पढ़ाया जाए? 

इस समस्या को सुलझाने में बाल मनोविज्ञान शिक्षक की सहायता करता है। बाल मनोविज्ञान सीखने की प्रक्रिया, विधियों, महत्‍वपूर्ण कारकों, लाभदायक और हानिकारक दशाओं, रुकावटों, सीखने का वक्र तथा प्रशिक्षण संक्रमण आदि विभिन्न तत्वों से परिचित कराता है। इनके ज्ञान से शिक्षक बालकों को सीखने में सहायता कर सकता है। शिक्षा, मनोविज्ञान शिक्षण की विधियों का भी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करता है और उनमें सुधार के उपाय बतलाता है। बाल-केन्द्रित शिक्षा में शिक्षण विधि को प्रयोग में लाते समय बाल-मनोविज्ञान को ही आधार बनाया जाता है।

मूल्यांकन और परीक्षण (Evaluation and Test)

शिक्षण से ही शिक्षक की समस्या हल नहीं हो जाती। उसे बालकों के ज्ञान और विकास का मूल्यांकन और परीक्षण करना होता है। मूल्यांकन से परीक्षार्थी की उन्नति का पता चलता है। शिक्षा की  प्रक्रिया में शिक्षक और शिक्षार्थी बार-बार यह जानना चाहते हैं कि उन्होंने कितनी प्रगति हासिल की है और यदि उन्हें सफलता अथवा असफलता मिली है, तो क्यों और उसमें क्या परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन सभी प्रश्नों को सुलझाने में मूल्यांकन के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के परीक्षणों और मापों की आवश्यकता पड़ती है।

भारतीय शिक्षा प्रणाली में मूल्यांकन शब्द परीक्षा, तनाव और दुश्चित से जुड़ा हुआ है। मूल्यांकन के इस तनाव एवं दुश्चिता को दूर करने के लिए वर्तमान बाल-केन्द्रित शिक्षा प्रणाली में सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन पर जोर दिया गया है, जो बालकों के इस प्रकार के तनाव एवं दुश्चिता को दूर करने में सहायक साबित हो रहा है। सतत् और व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) का अर्थ छात्रों के विद्यालय आधारित मूल्यांकन की प्रणाली से है जिसमें छात्रों के विकास के सभी पक्ष शामिल हैं। यह एक बच्चे की विकास प्रक्रिया है, जिसमें दोहरे उद्देश्यों पर बल दिया जाता है।

ये उद्देश्य एक ओर मूल्यांकन में निरन्तरता और व्यापक रूप से सीखने के मूल्यांकन पर तथा दूसरी ओर व्यवहार के परिणामों पर आधारित हैं। यहाँ निरन्तरता' का अर्थ इस पर बल देना है कि छात्रों की वृद्धि और विकास के अभिज्ञात पक्षों का मूल्यांकन एक बार के कार्यक्रम के बजाय एक निरन्तर प्रक्रिया है, जिसे सम्पूर्ण अध्यापन-अधिगम प्रक्रिया में निर्मित किया गया है और यह शैक्षिक सत्रों की पूरी अवधि में फैली हुई है। इसका अर्थ है मूल्यांकन की नियमितता, अधिगम अन्तरालों का निदान, सुधारात्मक उपायों का उपयोग, स्वयं मूल्यांकन के लिए अध्यापकों और छात्रों के साक्ष्य का फीडबैक अर्थात् प्रतिपुष्टि। दूसरा पद व्यापक का अर्थ है शैक्षिक और सह शैक्षिक पक्षों को शामिल करते हुए छात्रों की वृद्धि और विकास को परखने की योजना।

चूँकि क्षमताएँ, मनोवृत्तियाँ और सोच अपने आप को लिखित शब्दों के अलावा अन्य रूपों में प्रकट करती है, इसलिए यह पद अनेक साधनों और तकनीकों के अनुप्रयोग को सन्दर्भित करता है। (परीक्षणकारी और गैर परीक्षणकारी दोनों) और यह सीखने के क्षेत्रों में छात्रा के विकास के मूल्यांकन पर लक्षित है जैसे- ज्ञान, समझ, व्याख्या अनुप्रयोग, विश्लेषण, मूल्यांकन एवं सृजनात्मकता।

पाठ्यक्रम

समाज और व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्कूल के पाठ्यक्रम का विकास, व्यक्तिगत विभिन्नताओं, प्रेरणाओं, मूल्यों एवं सीखने के सिद्धान्तों के मनोवैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम बनाने में शिक्षक यह ध्यान रखता है कि शिक्षार्थी की और समाज की क्या आवश्यकताएँ हैं और सीखने की कौन-सी क्रियाओं से ये आवश्यकताएँ सर्वोत्तम रूप से पूर्ण हो सकती हैं? 

भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में तथा विभिन्न स्तरों पर कुछ सीखने की क्रियाएँ वांछनीय हो सकती हैं और कुछ अवांछनीय, यह निश्चित करने में शिक्षक को विकास की विभिन्न स्थितियों का मनोवैज्ञानिक ज्ञान होना चाहिए। इस तरह बाल-केन्द्रित शिक्षा में इस बात पर जोर दिया जाता है कि क्रियात्मक होने के लिए प्रत्येक पाठ्यक्रम एक समुचित मनोवैज्ञानिक आधार पर स्थापित हो।

व्यवस्थापन एवं अनुशासन

बाल-केन्द्रित शिक्षा के अन्तर्गत कक्षा व विद्यालय में अनुशासन एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाल मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है। उदाहरण के लिए कभी-कभी कुछ शरारती बालकों में अच्छे समायोजक के लक्षण दिखाई देते हैं, ऐसी परिस्थिति में शिक्षकों को उन्हें दबाने के स्थान पर प्रोत्साहित करने के बारे में सोचना पड़ता है।

बाल मनोविज्ञान ही शिक्षक को बतलाता है कि एक ही व्यवहार भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रेरणाओं के कारण हो सकता है। शिक्षक को उनके असली प्रेरक कारणों का पता लगाकर उनके अनुकूल व्यवहार करना होता है।

प्रयोग एवं अनुसन्‍धान

बाल-केन्द्रित शिक्षा में बालकों को प्रयोग एवं अनुसन्धान की ओर उन्मुख करने के लिए भी बाल मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है। नई-नई परिस्थितियों में नई-नई समस्याओं को सुलझाने के लिए शिक्षक को स्वयं प्रयोग करते रहना चाहिए और उससे निकले निष्कर्षों का उपयोग करना चाहिए।  मनोविज्ञान के क्षेत्र में होने वाले नये-नये अनुसन्धानों से जो नये-नये तथ्य प्रकाश में आते हैं, उनकी जाँच करने के लिए भी शिक्षक को प्रयोग करने की आवश्यकता है।

कक्षा में समस्याओं का निदान और निराकरण

बाल-केन्द्रित शिक्षा के अन्तर्गत कक्षा की विभिन्न प्रकार की समस्याओं को पहचानने एवं उनका निराकरण करने के लिए भी बालमनोविज्ञान का ही सहारा लिया जाता है।

प्रगतिशील शिक्षा

  1. प्रगतिशील शिक्षा पारम्परिक शिक्षा की प्रतिक्रिया का परिणाम है।
  2. प्रगतिशील शिक्षा की अवधारणा के विकास में संयुक्त राज्य अमेरिका के एक मनोवैज्ञानिक जॉन डीवी का विशेष योगदान है।
  3. प्रगतिशील शिक्षा की अवधारणा इस प्रकार है - शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य बालक की शक्तियों का विकास है। वैयक्तिक विभिन्नता के अनुरूप शिक्षण प्रक्रिया में भी अन्तर रखकर इस उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है।
  4. प्रगतिशील शिक्षा के अन्तर्गत प्रोजेक्ट विधि, समस्या विधि एवं क्रिया-कार्यक्रम जैसी शिक्षण-पद्धतियों को अपनाया जाता है।

प्रगतिशील शिक्षा के विकास में योगदान देने वाले मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त

मस्तिष्क एवं बुद्धि

मस्तिष्क एवं बुद्धि, मनुष्य की उन क्रियाओं के परिणाम हैं, जिन्हें वह जीवन की विभिन्न व्यावहारिक सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के लिए करता है। ज्यों-ज्यों वह जीवन की दैनिक क्रियाओं को करने में मानसिक शक्तियों का प्रयोग करता जाता हैं, त्यों-त्यों उसका विकास भी होता जाता है। क मस्तिष्क ही वह सबसे प्रमुख साधन है, जिसकी सहायता से मनुष्य अपनी समस्याओं का हल करता है। के एक साधन के रूप में मस्तिष्क के तीन प्रमुख रूप हैं चिन्तन, अनुभूति एवं संकल्प

ज्ञान

ज्ञान कर्म का ही परिणाम है। कर्म अनुभव से पूर्व आता है। अनुभव ज्ञान का स्रोत है। जिस प्रकार बालक अनुभव से यह समझता है कि अग्नि हाथ जला देती है, उसी प्रकार उसका सम्पूर्ण ज्ञान अनुभव पर आधारित होता है।

मौलिक प्रवृत्तियाँ

सभी ज्ञान व्यक्तियों की उन क्रियाओं के फलस्वरूप प्राप्त होता है, जो वे औपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने में करते हैं।

सुरक्षा, भोजन तथा वस्त्र के लिए मानव जो संघर्ष करता है। उसका परिणाम होता है कुछ क्रियाओं का प्रारम्भ और ये क्रियाएँ ही व्यक्ति की उन प्रवृत्तियों, मौलिक भावनाओं तथा रुचियों को जन्म देती है।

चिन्तन की प्रक्रिया

चिन्तन केवल मनन करने से पूर्ण नहीं होता और न ही भावना-समूह से इसकी उत्पत्ति होती है। चिन्तन का कुछ कारण होता है। किसी हेतु के आधार पर मनुष्य सोचना प्रारम्भ करता है। यदि मनुष्य की क्रिया सरलतापूर्वक चलती रहती है, तो उसे सोचने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती किन्तु जब उसकी प्रगति में बाधा पड़ती है, तो वह सोचने के लिए बाध्य हो जाता है।

मनोविज्ञान के उपरोक्त सिद्धान्तों एवं अवधारणाओं के आधार पर प्रगतिशील शिक्षा की नींव रखी गई है। जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि बालक को जो शिक्षा दी जाए, वह मानसिक क्रियाओं की विभिन्न दशाओं के अनुसार हो।

प्रगतिशील शिक्षा का महत्व

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि प्रगतिशील शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य बालक की शक्तियों का विकास होता है, इसलिए इसके अन्तर्गत इसी बात पर जोर दिया जाता है किन्तु बालक में विभिन्न शक्तियों का विकास किस प्रकार से होगा, इसके लिए कोई सामान्य सिद्धान्त निश्चित नहीं किया जा सकता। इसका कारण यह है कि भिन्न-भिन्न रुचियों और योग्यताओं के बालकों में विकास भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। इसलिए अध्यापक को बालक की योग्यताओं पर दृष्टि रखते हुए उसे निर्देशन देना चाहिए।

प्रगतिशील शिक्षा यह बताती है कि शिक्षा बालक के लिए है, बालक शिक्षा के लिए नहीं। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक बालक को सामाजिक विकास का पर्याप्त अवसर मिले। प्रगतिशील शिक्षा का उद्देश्य जनतन्त्रीय मूल्यों की स्थापना है। यह हमें बताता है कि बालक में जनतन्त्रीय मूल्यों का विकास किया जाना चाहिए। शिक्षा के द्वारा हम ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें व्यक्ति-व्यक्ति में कोई भेद न हो, सभी पूर्ण स्वतन्त्रता और सहयोग से काम करें।

प्रत्येक मनुष्य को अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों, इच्छाओं और आकांक्षाओं के अनुसार विकसित होने का अवसर मिले, सभी को समान अधिकार दिए जाएँ। ऐसा समाज तभी बन सकता है, जब व्यक्ति और समाज के हित में कोई मौलिक अन्तर न माना जाए। शिक्षा के द्वारा मनुष्य में परस्पर सहयोग और सामंजस्य की स्थापना होनी चाहिए। इस तरह, प्रगतिशील शिक्षा का उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का विकास करना और शिक्षा द्वारा जनतन्त्र को स्थापित करना होता है। प्रगतिशील शिक्षा में शिक्षण विधि को अधिक व्यावहारिक करने पर जोर दिया जाता है। इसमें बालक के स्वयं करके सीखने की प्रक्रिया पर जोर दिया जाता है।

 इस शिक्षण पद्धति में बालक के जीवन, क्रियाओं के विषयों में एकता स्थापित की जाती है। यह बालक के जीवन की क्रियाओं के चारों ओर सब विषय इस तरह बांध देता है कि क्रियाओं के द्वारा उनको ज्ञान प्राप्त हो सके। यहाँ पर शिक्षा-पद्धति को बालक की रुचि पर आधारित करने की बात आती है। प्रगतिशील शिक्षा के अन्तर्गत डीवी ने शिक्षा में दो तत्वों को विशेष महत्वपूर्ण माना है रुचि और प्रयास। 

अध्यापक को बालक की स्वाभाविक रुचियों को समझकर उसके लिए उपयोगी कार्यों की व्यवस्था करनी चाहिए। बालक को स्वयं कार्यक्रम बनाने का अवसर दिया जाना चाहिए। इससे वे अपनी रुचियों के अनुसार कार्यक्रम बना सकेंगे। इनमें किसी प्रकार के दबाव और भय की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तभी कार्यक्रम रुचि के अनुसार हो सकेंगे और तभी स्कूल की क्रिया आत्म-क्रिया बन सकेगी।

डीवी की शिक्षा-पद्धति सम्बन्धी इन विचारों के आधार पर ही आगे चलकर प्रोजेक्ट प्रणाली का जन्म हुआ, जिसके अनुसार बालक को ऐसे काम दिए जाने चाहिए, जिनसे उसमें स्फूर्ति, आत्मविश्वास, आत्म-निर्भरता और मौलिकता का विकास हो सके।  प्रगतिशील शिक्षा में शिक्षक को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसके अनुसार शिक्षक समाज का सेवक है। उसे विद्यालय में ऐसे वातावरण का निर्माण करना पड़ता है, जिसमें पलकर बालक के सामाजिक व्यक्तित्व का विकास हो सके और वह जनतन्त्र का योग्य नागरिक बन सके।

डीवी ने शिक्षक को यहाँ तक महत्व दिया है कि उसे समाज में ईश्वर का प्रतिनिधि ही कह दिया है। विद्यालय में स्वतन्त्रता और समानता के मूल्य बनाए रखने के लिए शिक्षक को अपने को बालकों से बड़ा नहीं समझना चाहिए। उसे आज्ञाओं और उपदेशों के द्वारा अपने विचारों और प्रवृत्तियों को बालकों पर लादने का प्रयास नहीं करना चाहिए। को समझकर उनके अनुरूप कार्यों में लगना चाहिए। इस प्रकार विद्यालय में शिक्षा बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर दी जानी चाहिए। इससे विद्यालय के संचालन में कठिनाई बहुत कम हो जाती है।

प्रगतिशील शिक्षा के अन्तर्गत अनुशासन बनाए रखने के लिए बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों को कुंण्ठित करना अनुचित माना जाता है। वास्तव में, अनुशासन केवल बालक के निजी व्यक्तित्व पर ही निर्भर नहीं है, उसका सामाजिक परिस्थितियों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। सच्चा अनुशासन सामाजिक अनुशासन है और यह बालक के  विद्यालय के सामूहिक कार्यों में भाग लेने से उत्पन्न होता है। विद्यालय में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाना चाहिए कि बालक परस्पर सहयोग से रहने का अभ्यास करें।

विद्यालय में एकसमान उद्देश्य लेकर सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक और शारीरिक कार्यों में एकसाथ भाग लेने से बालकों में अनुशासन उत्पन्न होता है और उन्हें नियमित रूप से काम करने की आदत पड़ती है। विद्यालयों में कार्यक्रमों का बालक के चरित्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। बालक को प्रत्यक्ष रूप से उपदेश न देकर उसे सामाजिक परिवेश दिया जाना चाहिए और उसके सामने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए जाने चाहिए कि उसमें आत्मानुशासन उत्पन्न हो और वह सही अर्थों में सामाजिक प्राणी बने। यह ठीक है कि विद्यालय में शान्तिपूर्ण वातावरण होने से काम अधिक अच्छा होता है किन्तु शान्ति साधन है, साध्य नहीं।

शिक्षक को तो, अपनी ओर से बालकों को उनकी प्रवृत्तियों के अनुसार नाना प्रकार के कामों में लगाए रखना चाहिए और यदि इस प्रक्रिया में कभी-कभी कुछ अशान्ति भी उत्पन्न हो, तो उसे दूर करने के लिए बालक की क्रियाओं पर रोक-टोक करना उचित नहीं है। आत्मानुशासन उत्पन्न करने में उत्तरदायित्व की भावना का विशेष महत्व है। उसे उत्पन्न करने के लिए विद्यालय के अधिकतर काम स्वयं विद्यार्थियों को सौंप दिए जाने चाहिए।

इनमें भाग लेने से उनमें अनुशासन की भावना उत्पन्न होगी। प्रगतिशील शिक्षा के सिद्धान्तों के अनुरूप ही आजकल शिक्षा की अनिवार्य और सार्वभौमिक बनाने पर जोर दिया जाता है। शिक्षा का लक्ष्य व्यक्तित्व का विकास है और प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व का विकास करने के लिए शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया जाना चाहिए। आधुनिक शिक्षा में वैज्ञानिक और सामाजिक प्रवृत्ति प्रगतिशील शिक्षा का योगदान है। इसके अनुसार शिक्षा एक सामाजिक आवश्यकता है। इसका लक्ष्य व्यक्ति और समाज दोनों का विकास है। इससे व्यक्ति का शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास होता है।

प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण

सार्वभौमीकरण का अर्थ होता है सब के लिए उपलब्ध कराना। प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के अन्तर्गत देश के सभी बच्चों के लिए पहली से आठवीं कक्षा तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करने का उद्देश्य सुनिश्चित किया गया। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि इस अनिवार्य शिक्षा के लिए स्कूल बच्चों के घर के समीप हो तथा चौदह वर्ष तक बच्चे स्कूल न छोड़ें। 

ओपरेशन ब्लैक बोर्ड, न्यूनतम शिक्षा स्तर, मध्याह्न भोजन स्कीम, पोषाहार सहायता कार्यक्रम, जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, सर्वशिक्षा अभियान, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, प्राथमिक शिक्षा कोष इत्यादि प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण से सम्बन्धित कुछ प्रमुख कार्यक्रम हैं।

12 June 2021

बुद्धि (Intelligence)

बुद्धि (Intelligence) शब्‍द का प्रयोग सामान्यतः प्रज्ञा, प्रतिभा, ज्ञान एवं समझ इत्यादि के अर्थों में किया जाता है। यह वह शक्ति है जो हमें समस्याओं का समाधान करने एवं उद्देश्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।

  • एल.एम. टर्मन ने बुद्धि की परिभाषा इस प्रकार दी है, बुद्धि अमूर्त विचारों के सन्दर्भ में सोचने की योग्यता हैं।
  • स्टर्न के अनुसार, बुद्धि व्यक्ति की वह सामान्य योग्यता है जिसके द्वारा वह सचेत रूप से नवीन आवश्यकताओं के अनुसार चिन्तन करता है। इस तरह, जीवन की नई समस्याओं एवं स्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालने की सामान्य मानसिक योग्यता बुद्धि कहलाती है। 
यद्यपि बुद्धि के सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिकों में मतभेद हैं, फिर भी यह निश्चित तौर पर कहा जाता है कि यह किसी के व्यक्तित्व का मुख्य निर्धारक है, क्योंकि इससे व्यक्ति की योग्यता का पता चलता है। इसे व्यक्ति की जन्मजात शक्ति कहा जाता है, जिसके उचित विकास में उसके परिवेश की प्रमुख होती है। मानव विकास की विभिन्न अवस्थाओं में बुद्धि के विकास में भी अन्तर होता है। बुद्धि के मुख्य तीन पक्ष होते हैं कार्यात्मक, संरचनात्मक एवं क्रियात्मक। बुद्धि को मुख्यतः तीन श्रेणियों में रखा गया है सामाजिक बुद्धि, स्थूल बुद्धि एवं अमूर्त बुद्धि। वंशानुक्रम एवं वातावरण तथा इन दोनों की अन्त:क्रिया बुद्धि को निर्धारित करने वाले कारक हैं।

बुद्धि


बुद्धि के सिद्धान्‍त

कुछ मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि के स्वरूप से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है, जिनसे बुद्धि के सम्बन्ध में कई प्रकार की महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं।

बुद्धि की परिभाषाएँ  

  • पिन्टर जीवन की अपेक्षाकृत नवीन परिस्थितियों से अपना सामंजस्य करने की व्यक्ति की : ! योग्यता ही बुद्धि है।
  • रायबर्न बुद्धि वह शक्ति है, जो हमें समस्याओं का समाधान करने और उद्देश्यों को प्राप्त : करने की क्षमता देती है।
  • वेश्लर बुद्धि किसी व्यक्ति के द्वारा उद्देश्यपूर्ण ढंग से कार्य करने, तार्किक चिन्तन करने ! तथा वातावरण के साथ प्रभावपूर्ण ढंग से क्रिया करने की सामूहिक योग्यता है।
  • वुडवर्थ बुद्धि, कार्य करने की एक विधि है।
  • वुडरों बुद्धि, ज्ञान अर्जन करने की क्षमता है।
  • हेनमॉन बुद्धि में मुख्य तत्व होते हैं ज्ञान की क्षमता एवं निहित ज्ञान।
  • थॉनडाइक सत्य या तथ्य के दृष्टिकोण से उत्तम प्रतिक्रियाओं की शक्ति ही बुद्धि है।
  • कॉलविन यदि व्यक्ति ने अपने वातावरण से सामंजस्य करना सीख लिया है या सीख सकता है, तो उसमें बुद्धि है।

उपरोक्‍त परिभाषाओं के अनुसार हम यह कह सकते है कि बुद्धि अमूर्त चिन्‍तन की योग्‍यता अनुभव से लाभ उठाने की योग्यता, अपने वातावरण से सामंजस्य करने की योग्यता, सीखने की योग्यता, समस्या समाधान करने की योग्यता तथा सम्बन्धों को समझने की योग्यता है। :

एक कारक सिद्धान्‍त

एक-कारक सिद्धान्त का प्रतिपादन बिने (Bine) ने किया और इस सिद्धान्त का समर्थन कर इसको आगे बढ़ाने का श्रेय टर्मन और स्टर्न जैसे मनोवैज्ञानिकों को है। इन मनोवैज्ञानिकों का मत है बुद्धि एक अविभाज्य इकाई है। स्पष्ट है कि इस सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि को एक शक्ति या कारक के रूप में माना गया है।

इन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बुद्धि वह मानसिक शक्ति है, जो व्यक्ति के समस्त कार्यों का संचालन करती है तथा व्यक्ति के समस्त व्यवहारों को प्रभावित करती है।

द्वि-कारक सिद्धान्‍त

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक स्पीयरमैन हैं। उनके अनुसार बुद्धि में दो कारक हैं अथवा सभी प्रकार के मानसिक कार्यों में दो प्रकार की मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है। प्रथम सामान्य मानसिक योग्यता, द्वितीय विशिष्ट मानसिक योग्यता।

प्रत्येक व्यक्ति में सामान्य मानसिक योग्यता के अतिरिक्त कुछ-न-कुछ विशिष्ट योग्यताएँ पाई जाती हैं।

एक व्यक्ति जितने ही क्षेत्रों अथवा विषयों में कुशल होता है, उसमें उतनी ही विशिष्ट योग्यताएँ पाई जाती हैं।  यदि एक व्यक्ति में एक से अधिक विशिष्ट योग्यताएँ हैं, तो इन विशिष्ट योगयताओं में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं पाया जाता है।

स्पीयरमैन का यह विचार है कि एक व्यक्ति में सामान्य योग्यता की मात्रा जितनी ही अधिक पाई जाती है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान होता है।

बहुकारक सिद्धान्त Multi-Factor Theory

इस सिद्धान्त के मुख्य समर्थक थॉर्नडाइक थे।

इस सिद्धान्त के अनुसार, बुद्धि कई तत्वों का समूह होती है और प्रत्येक तत्व में कोई सूक्ष्म योग्यता निहित होती है। अत: सामान्य बुद्धि नाम की कोई चीज नहीं होती, बल्कि बुद्धि में कोई स्वतन्त्र, विशिष्ट योग्यताएँ निहित रहती हैं, जो विभिन्न कायाँ को सम्पादित करती हैं।

बुद्धि के सिद्धान्त

  1. एक-कारक सिद्धान्त - बिने, टर्मन, स्टर्न
  2. द्वि-कारक सिद्धान्त - स्पीयरमैन
  3. बहुकारक सिद्धान्त - थॉर्नडाइक
  4. समूहकारक सिद्धान्त – थर्सटन  
  5. पदानुक्रमिक सिद्धान्त (त्रि-आयामी) - जे.पी. गिलफोर्ड
  6. तरल ठोस बुद्धि सिद्धान्त - आर.बी. कैटेल
  7. बहुबुद्धि सिद्धान्त - हॉवर्ड गार्डनर

प्रतिदर्श सिद्धान्त

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन थॉमसन ने किया था। उसने अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन स्पीयरमैन के द्धि-कारक सिद्धान्त के विरोध में किया था।

थॉमसन ने इस बात का तर्क दिया कि व्यक्ति का बौद्धिक व्यवहार अनेक स्वतन्त्र योग्यताओं पर निर्भर करता है, किन्तु इन स्वतन्त्र योग्यताओं का क्षेत्र सीमित होता है।

प्रतिदर्श सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि कई स्वतन्त्र तत्वों से बनी होती है। कोई विशिष्ट परीक्षण या विद्यालय सम्बन्धी क्रिया में इनमें से कुछ तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। यह भी हो सकता है कि दो या अधिक परीक्षाओं में एक ही प्रकार के तत्व दिखाई दें तब उनमें एक सामान्य तत्व की विद्यमानता मानी जाती है। यह भी सम्भव है कि अन्य परीक्षाओं में विभिन्न तत्व दिखाई दें तब उनमें कोई भी तत्व सामान्य नहीं होगा और प्रत्येक तत्व अपने आप में विशिष्ट होगा।

ग्रुप-तत्व सिद्धान्त

जो तत्व सभी प्रतिभात्मक योग्यताओं में तो सामान्य नहीं होते परन्तु कई क्रियाओं में सामान्य होते हैं, उन्हें ग्रुप-तत्व की संज्ञा दी गई है।

इस सिद्धान्त के समर्थकों में थर्सटन का नाम प्रमुख है। प्रारम्भिक मानसिक योग्यताओं का परीक्षण करते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि कुछ मानसिक क्रियाओं में एक प्रमुख तत्व सामान्य रूप से विद्यमान होता है, जो उन क्रियाओं के कई ग्रुप होते हैं, उनमें अपना एक प्रमुख तत्व होता है।

ग्रुप तत्व सिद्धान्त की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह सामान्य तत्व की धारणा का खण्डन करता है।

गिलफोर्ड का सिद्धान्‍त

जे.पी. गिलफोर्ड और उसके सहयोगियों ने बुद्धि परीक्षण से सम्बन्धित कई परीक्षणों पर कारक विश्लेषण तकनीक का प्रयोग करते हुए मानव बुद्धि के विभिन्न तत्वों या कारकों को प्रकाश में लाने वाला प्रतिमान विकसित किया।

उन्होंने अपने अध्ययन प्रयासों के द्वारा यह प्रतिपादित करने की चेष्टा की कि हमारी किसी भी मानसिक प्रक्रिया अथवा बौद्धिक कार्य को तीन आधारभूत आयामों-संक्रिया, सूचना सामग्री या विषय-वस्तु तथा उत्पादन में विभाजित किया जा सकता है।

संक्रिया का अर्थ यहाँ हमारी उस मानसिक चेष्टा, तत्परता और कार्यशीलता से होता है जिसकी मदद से हम किसी भी सूचना सामग्री या विषय-वस्तु को अपने चिन्तन तथा मनन का विषय बनाते हैं या दूसरे शब्दों में इसे चिन्तन तथा मनन का प्रयोग करते हुए अपनी बुद्धि को काम में लाने का प्रयास कहा जा सकता है।

फ्लूइड तथा क्रिस्टलाइज्ड सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक कैटिल हैं। फ्लूइड वंशानुक्रम कार्य कुशलता अथवा केन्द्रीय नाड़ी संस्थान की दी हुई विशेषता पर आधारित एक सामान्य योग्यता है। यह सामान्य योग्यता संस्कृति से ही प्रभावित नहीं होती बल्कि नवीन एवं विगत परिस्थितियों से भी प्रभावित होती है।

दूसरी ओर क्रिस्टलाइज्ड भी एक प्रकार की सामान्य योग्यता है जो अनुभव, अधिगम तथा वातावरण सम्बन्धी कारकों पर आधारित होती है।

बहुआयामी बुद्धि

केली एवं थर्सटन नामक मनोवैज्ञानिकों ने बताया कि बुद्धि का निर्माण प्राथमिक मानसिक योग्यताओं के द्वारा होता है। केली के अनुसार, बुद्धि का निर्माण इन योग्यताओं से होता है वाचिक योग्यता, संगीतात्मक योग्यता, स्थानिक सम्बन्धों के साथ उचित ढंग से व्यवहार करने की योग्यता, रुचि और शारीरिक योग्यता। थर्सटन का मत है कि बुद्धि इन प्राथमिक मानसिक योग्यताओं का समूह होता है प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी योग्यता, तार्किक व वाचिक योग्यता, सांख्यिकी योग्यता, स्थानिक या दृश्य योग्यता, समस्या समाधान की योग्यता, स्मृति सम्बन्धी योग्यता, आगमनात्मक योग्यता और निगमनात्मक योग्यता। वैसे तो अधिकतर मनोवैज्ञानिकों ने केली एवं थर्सटन के बुद्धि सिद्धान्तों की आलोचना की, किन्तु अधिकतर मनोवैज्ञानिकों ने यह भी माना कि बुद्धि का बहुआयामी होना निश्चित तौर पर सम्भव है। बहुआयामी बुद्धि होने के कारण ही कुछ लोग कई प्रकार के कौशलों में निपुण होते हैं।

मानसिक आयु एवं बुद्धि – परीक्षण

बुद्धि-परीक्षण के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व की विशेषताओं का पता लगाया । जाता है।

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि के प्रामाणिक मापन की विधियों की खोज की। इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम जर्मन मनोवैज्ञानिक वुण्ट का नाम आता है, जिसने 1879 में बुद्धि के मापन के लिए मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना की।

फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड बिने एवं उसके साथी साइमन ने बुद्धि के मापन का आधार बच्चों के निर्णय, स्मृति, तर्क एवं आंकिक जैसे मानसिक कार्यों को माना। उन्होंने इन कार्यों से सम्बन्धित अनेक प्रश्न तैयार किए और उन्हें अनेक बच्चों पर आजमाया। 

इस परीक्षण के अनुसार जो बालक अपनी आयु के निर्धारित सभी प्रश्नों के सही उत्तर देता है वह सामान्य बुद्धि का होता है,

  •  जो अपनी आयु से ऊपर की आयु के बच्चों के लिए निर्धारित प्रश्नों के उत्तर भी दे देता है, वह उच्च बुद्धि का होता है, जो अपनी आयु से ऊपर की आयु के बच्चों के लिए निर्धारित सभी प्रश्नों के सही उत्तर देता है वह सर्वोच्च बुद्धि का होता है एवं 
  • जो अपनी आयु के बच्चों के लिए निर्धारित प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दे पाता वह निम्न बुद्धि का होता है। 

उपरोक्त मनोवैज्ञानिकों के बाद सर्वप्रथम विलियम स्टर्न ने बुद्धि के मापन के लिए बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient-IQ) के प्रयोग का सुझाव दिया।

टर्मन ने सर्वप्रथम बुद्धि-लब्धांक ज्ञात करने की विधि बताई। इसके अनुसार बुद्धि-लब्धि को बच्चे की मानसिक आयु को उसकी वास्तविक आयु से भाग करके, 100 से गुणा करने पर प्राप्त की जाती है। इसके अनुसार बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient-IQ) का सूत्र है

उदाहरणस्वरूप, यदि किसी बालक की मानसिक आयु 12 वर्ष और वास्तविक आयु 10 वर्ष है, तो उसकी बुद्धि-लब्धि की गणना इस प्रकार होगी

मनोवैज्ञानिक वेश्लर द्वारा निर्मित IQ वितरण

  1. 130 या इससे ऊपर - अति श्रेष्ठ बुद्धि अर्थात् प्रतिभाशाली बुद्धि
  2. 120-129 - श्रेष्ठ बुद्धि
  3. 110-119 - उच्च सामान्य बुद्धि
  4. 90-109  - सामान्य बुद्धि
  5. 80-89  - मन्द बुद्धि
  6. 70-79  - क्षीण बुद्धि
  7. 69 से नीचे निश्चित - क्षीण बुद्धि

मनोवैज्ञानिक मैरिल द्वारा निर्मित IQ वितरण

  1. 140 या इससे ऊपर - अति श्रेष्ठ बुद्धि अर्थात् प्रतिभाशाली बुद्धि
  2. 120-139  - श्रेष्ठ बुद्धि
  3. 110-119 - उच्च सामान्य बुद्धि
  4. 90-109 - सामान्य बुद्धि
  5. 80-89 - मन्द बुद्धि
  6. 70-79 - क्षीण बुद्धि
  7. 69 से नीचे - निश्चित क्षीण बुद्धि

बौद्धिक विवृद्धि और विकास

बौद्धिक विवृद्धि और विकास अनेक कारकों पर निर्भर करता है। मस्तिष्क और सम्बन्धित स्नायुओं की परिपक्वता बौद्धिक विवृद्धि को सर्वाधिक प्रभावित करती है। जन्म के समय बालक में उसकी बौद्धिक योग्यताएँ अनेक विकास की प्रथमावस्था के निम्नतम स्तर पर होती हैं। बालक की आयु बढ़ने के साथ-साथ उसकी बौद्धिक योग्यताओं में विवृद्धि और विकास होता रहता है। शैशवावस्था से बाल्यावस्था तक यह विकास तीव्र गति से होता है परन्तु किशोरावस्था के अन्त से और प्रौढ़ावस्था में इस विकास की गति मन्द हो जाती है।  

थर्सटन का विचार है कि उसके द्वारा किए गए कारक विश्लेषण अध्ययनों के आधार पर प्राप्त सात प्राथमिक मानसिक योग्यताएँ एकसाथ एकसमान आयु स्तर पर परिपक्व नहीं होती हैं। उसके अनुसार प्रत्यक्षपरक योग्यता बारह वर्ष की अवस्था में अपनी विवृद्धि की पूर्णता की ओर अग्रसर होती है। इसी प्रकार चौदह वर्ष की अवस्था में वस्तु प्रेक्षक तथा तार्किक योग्यता सोलह वर्ष की आयु में स्मृति योग्यता और संख्यात्मक योग्यता परिपक्वावस्था की ओर अग्रसर होती है। बालकों की शाब्दिक योग्यता तथा भाषा बोध आदि योग्यताएँ इस आयु अवस्था के बाद विकसित होती हैं।

वेश्लर का विचार है कि बौद्धिक विवृद्धि कम-से-कम बीस वर्ष की आयु तक होती रहती है। आधुनिक शोधों से यह पता चला है कि साठ वर्ष की आयु तक बुद्धि-लब्धांक में वृद्धि होती रहती है।

शिक्षा के क्षेत्र में बुद्धि-परीक्षणों का महत्व

शैक्षणिक मार्गदर्शन

विज्ञान के साथ-साथ मनोविज्ञान ने मानवीय समस्याओं के समाधान में अपूर्व योगदान दिया है। इसके द्वारा बच्चों के भविष्य निर्धारण की योजनाओं को बनाया जा रहा है। इसी प्रकार से शिक्षा के क्षेत्र में सही दिशा एवं लक्ष्य को प्राप्त करने में बुद्धि परीक्षाएँ समर्थ होती हैं। शिक्षा के विकास के लिए प्राथमिक एवं गौण दोनों ही प्रकार के पाठ्यक्रमों की आवश्यकता होती है। प्राथमिक पाठ्यक्रम बालकों को अच्छा नागरिक बनाने के लिए प्रस्तुत किया जाता है, जबकि गौण पाठ्यक्रम उनकी आदत के अनुसार निश्चित किया जाता है। बुद्धि परीक्षणों द्वारा प्रत्येक छात्र की सही उन्नति के मार्ग को प्रशस्त किया जाता है।

छात्र वर्गीकरण

ज्ञान की ग्रहणशीलता छात्रों की मानसिकता पर निर्भर करती है। फलस्वरूप, एक ही कक्षा-शिक्षण का निष्पादन भिन्न-भिन्न होता है।

ज्ञान अर्जन बालकों की बुद्धि क्षमता पर सीधा प्रभाव डालता है। अत: छात्र वर्गीकरण में बुद्धि परीक्षाएँ उपयोगी होती हैं।

वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक कक्षा में सामान्य, सामान्य से उच्च एवं सामान्य से नीचे आदि स्तरों के छात्र-छात्राएँ अध्ययनरत रहते हैं। प्रश्न उठता है कि क्या सभी बच्चों का शैक्षिक विकास उत्तम हो सकेगा? ऐसी परिस्थिति में, बुद्धि-परीक्षण के माध्यम से शिक्षक सामान्य, सामान्य से भिन्न एवं उच्च आदि छात्रों का वर्गीकरण करके उपयुक्त शिक्षण का प्रबन्ध करेगा ताकि सभी स्तरों के छात्र-छात्राएँ पाठ्यक्रम को धारण करके उत्तम निष्पादन प्रस्तुत कर सकें।

इस प्रकार बुद्धि-परीक्षण से अध्यापकीय, छात्र एवं पाठ्यक्रम सम्बन्धी सभी समस्याएँ आसानी से समाप्त हो जाती हैं।

यौन-भिन्नता में उपयोगी

शोध कार्यों से स्पष्ट हुआ है कि लड़के एवं लड़कियों में बुद्धि के आधार पर ही कार्यकुशलताओं में अन्तर पाया जाता है। इनके शारीरिक एवं मानसिक विकास का क्रम भिन्न होता है। अत: ज्ञान अर्जन की क्षमताओं में भी भिन्नता पाई जाती है।

स्पीयरमैन के अनुसार, दोनों में सामान्य एवं विशिष्ट योग्यताएँ पाई जाती हैं और इनका निर्धारण बुद्धि-परीक्षणों के आधार पर ही सम्भव है। अत: सामाजिक व्यवस्था को सामान्य बनाए रखने के लिए यौन-भिन्नता के आधार पर विभिन्न अन्तरों की पहचान कर उनके बीच समायोजन स्थापित करने के लिए बुद्धि-परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है।

स्‍वयं का ज्ञान

शिक्षा का प्रयत्न बच्चों का सामान्य विकास करना होता है। बुद्धि परीक्षण के जरिए बच्चे अपने भीतर की क्षमताओं एवं शक्तियों को पहचानकर अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति आसानी से कर सकते हैं।

बुद्धि परीक्षाएँ बालकों के व्यक्तित्व के स्वरूप को स्पष्ट करती हैं। वह अपने भीतर विघटित तत्‍वों को निकाल देता है और अविघटित तत्‍वों को विकसित करता है।

अधिगम प्रणाली में उपयोगी

सीखने की प्रक्रिया बुद्धि पर निर्भर करती है। छात्र की लगन, अभ्यास प्रक्रिया, गलतियों का निरसन, धारणा एवं प्रोत्साहन में वृद्धि एवं स्थानान्तरण आदि में बुद्धि का प्रभाव सर्वाधिक होता है।

बुद्धि परीक्षणों ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रतिभाशाली बच्चे कम समय में अधिक अधिगम एवं ज्ञान अर्जित करने में सक्षम होते हैं।

व्‍यावसायिक मार्गदर्शन

व्यवसाय में मनोविज्ञान ने पर्दापण करके विभिन्न समस्याओं का समाधान निकाला है। विभिन्न व्यवस्थाओं के लिए भिन्न प्रकार के मानसिक स्तर के व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। उपयुक्त मानसिक स्तर का व्यक्ति अपने व्यवसायों को उन्नतिमय बनाने में सहायक होता है।

11 June 2021

भाषा (Language)

भाषा भावों को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम है। मनुष्य पशुओं से इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास अभिव्यक्ति के लिए एक ऐसी भाषा होती है, जिसे लोग समझ सकते हैं।

भाषा बौद्धिक क्षमता को भी अभिव्यक्त करती है।

बहुत-से लोग वाणी और भाषा दोनों का प्रयोग एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में करते हैं, परन्तु दोनों में बहुत अन्तर है।

भाषा


हरलॉक ने दोनों शब्‍दों को निम्‍नलिखित रूप से स्‍पष्‍ट किया है।

  1. भाषा में सम्प्रेषण के वे सभी साधन आते हैं, जिसमें विचारों और भावों को प्रतीकात्मक बना दिया जाता है जिससे कि अपने विचारों और भावों को दूसरे से अर्थपूर्ण ढंग से कहा जा सके।
  2. वाणी भाषा का एक स्वरूप है जिसमें अर्थ को दूसरों को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ ध्वनियाँ या शब्द उच्चारित किए जाते हैं। ड वाणी भाषा का एक विशिष्ट ढंग है। भाषा व्यापक सम्प्रत्यय है। वाणी, भाषा का एक माध्यम है।

बालकों में भाषा का विकास

बालक के विकास के विभिन्न आयाम होते हैं। भाषा का विकास भी उन्हीं आयामों में से एक है। भाषा को अन्य कौशलों की तरह अर्जित किया जाता है। यह अर्जन बालक के जन्म के बाद ही प्रारम्भ हो जाता है। अनुकरण, वातावरण के साथ अनुक्रिया तथा शारीरिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की माँग इसमें विशेष भूमिका निभाती है।

भाषा विकास की प्रारम्भिक अवस्था

इस अवस्था में एक तरह से बालक ध्वन्यात्मक संकेतों से युक्त भाषा को समझने और प्रयोग करने के लिए स्वयं को तैयार करता हुआ प्रतीत होता है जिसकी अभिव्यक्ति उसकी निम्न प्रकार की चेष्टाओं तथा क्रियाओं के रूप में होती है

सबसे पहले चरण के रूप में बालक जन्म लेते ही रोने, चिल्लाने की चेष्टाएँ करता है।

रोने-चिल्लाने की चेष्टाओं के साथ ही वह अन्य ध्वनि या आवाजें भी निकालने लगता है। ये ध्वनियाँ पूर्णतः स्वाभाविक, स्वचालित एवं नैसर्गिक होती हैं, इन्हें सीखा नहीं जाता।

उपरोक्त क्रियाओं के बाद बालकों में बड़बड़ाने की क्रियाएँ तथा चेष्टाएँ शुरू हो जाती हैं। इस बड़बड़ाने के माध्यम से बालक स्वर तथा व्यंजन ध्वनियों के अभ्यास का अवसर पाते हैं। वे कुछ भी दूसरों से सुनते हैं तथा जैसा उनकी समझ में आता है उसी रूप में वे उन्हीं ध्वनियों को किसी-न-किसी रूप में दोहराते हैं। इनके द्वारा स्वरों जैसे अ, ई, उ, ऐ, इत्यादि को व्यंजनों त, म, न, क, इत्यादि से पहले उच्चरित किया जाता है।

हाव-भाव तथा इशारों की भाषा भी बालकों को धीरे-धीरे समझ में आने लगती है। इस अवस्था में वे प्राय: एक-दो स्वर-व्यंजन ध्वनियाँ निकाल कर उसकी पूर्ति अपने हाव-भाव तथा चेष्टाओं से करते दिखाई देते हैं।

भाषा का महत्‍व

इच्छाओं और आवश्यकताओं की सन्‍तुष्टि भाषा व्यक्ति को अपनी आवश्यकता, इच्छा, पीड़ा अथवा मनोभाव दूसरे के समक्ष व्यक्त करने की क्षमता प्रदान करती है जिससे दूसरा व्यक्ति सरलता से उसकी आवश्यकताओं को समझकर तत्सम्बन्धी समाधान प्रदान करता है।

ध्यान खींचने के लिए सभी बालक चाहते हैं कि उनकी ओर लोग ध्यान दें इसलिए वे अभिभावकों से प्रश्न पूछकर, कोई समस्या प्रस्तुत करके तथा विभिन्न तरीकों का प्रयोग कर उनका ध्यान अपनी ओर खींचते हैं।

सामाजिक सम्बन्ध के लिए भाषा के माध्यम से ही कोई व्यक्ति समाज के साथ । आपसी ताल-मेल विकसित कर पाता है। भाषा के जरिए अपने विचारों को अभिव्यक्त कर समाज में अपनी भूमिका निर्धारित करता है। अन्तर्मुखी बालक समाज से कम अन्त:क्रिया करते हैं, इसलिए उनका पर्याप्त सामाजिक विकास नहीं होता।

सामाजिक मूल्यांकन के लिट महत्व बालक समाज के लोगों के साथ किस तरह बात करता है? कैसे बोलता है? इन प्रश्नों के उत्तर के माध्यम से उसका सामाजिक मूल्यांकन होता है।

शैक्षिक उपलब्धि के महत्व भाषा का सम्बन्ध बौद्धिक क्षमता से है। यदि बालक अपने विचारों को भाषा के जरिए अभिव्यक्त करने में सक्षम नहीं होता, तो इसका अर्थ है कि उसकी शैक्षिक उपलब्धि पर्याप्त नहीं है।

दूसरों के विचारों को प्रभावित करने के लिए जिन बच्चों की भाषा प्रिय, मधुर एवं ओजस्वी होती है वे अपने समूह, परिवार अथवा समाज के व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं। लोग उन्हीं को अधिक महत्व देते हैं जिनका भाषा व्यवहार प्रभावपूर्ण होता है।

बालकों की आयु
बालकों का शब्‍द भण्‍डार
जन्‍म से 8 माह तक
0
9 माह से 12 माह तक
तीन से चार शब्‍द
डेढ़ वर्ष तक
10 या 12 शब्‍द
2 वर्ष तक
272 शब्‍द
ढ़ाई वर्ष तक
450 शब्‍द
3 वर्ष तक
1 हजार शब्‍द
साढ़े तीन वर्ष तक
1250 शब्‍द
4 वर्ष तक
1600 शब्‍द
5 वर्ष तक
2100 शब्‍द
11 वर्ष तक
50000 शब्‍द
14 वर्ष तक
80000 शब्‍द
16 वर्ष से आगे
1 लाख से अधिक शब्‍द

भाषा विकास के सिद्धांत

परिपक्वता का सिद्धान्त परिपक्वता का तात्पर्य है कि भाषा अवयवों एवं स्वरों पर नियन्त्रण होना। बोलने में जिहवा, गला, तालु, होंठ,  दाँत तथा स्वर यन्त्र आदि जिम्मेदार होते हैं। इनमें किसी भी प्रकार की कमजोरी या कमी वाणी को प्रभावित करती है। इन सभी अंगों में जब परिपक्वता होती है, तो भाषा पर नियन्त्रण होता है और अभिव्यक्ति अच्छी होती है।

अनुबन्धन का सिद्धान्त भाषा विकास में अनुबन्धन या साहचर्य का बहुत योगदान है। शैशवावस्था में जब बच्चे शब्द सीखते हैं, तो सीखना अमूर्त नहीं होता है, बल्कि किसी मूर्त वस्तु से जोड़कर उन्हें शब्दों की जानकारी दी जाती है। इसी तरह बच्चे विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति साहचर्य स्थापित करते हैं और अभ्यास हो जाने पर सम्बद्ध वस्तु या व्यक्ति की उपस्थिति पर सम्बन्धित शब्द से सम्बोधित करते हैं।

अनुकरण का सिद्धान्त  चैपिनीज, शलों, कर्टी तथा वैलेण्टाइन आदि मनोवैज्ञानिकों ने अनुकरण के द्वारा भाषा सीखने पर अध्ययन  किया है। इनका मत है कि बालक अपने परिवारजनों तथा साथियों की भाषा का अनुकरण करके सीखते हैं। जैसी भाषा जिस समाज या परिवार में : बोली जाती है बच्चे उसी भाषा को सीखते हैं। यदि बालक के समाज या परिवार में प्रयुक्त भाषा में कोई दोष हो, तो उस बालक की भाषा में भी दोष !

चोमस्की का भाषा अर्जित करने का सिद्धान्त चोमस्की का कहना है कि बच्चे शब्दों की निश्चित संख्या से कुछ निश्चित नियमों का अनुकरण करते हुए वाक्यों का निर्माण करना सीख जाते हैं। इन शब्दों से नये-नये वाक्यों एवं शब्दों का निर्माण होता है। इन वाक्यों : का निर्माण बच्चे जिन नियमों के अन्तर्गत करते हैं उन्हें चोमस्की ने जेनेरेटिव ग्रामर की संज्ञा प्रदान की है।

भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक

स्वास्थ्य जिन बच्चों का स्वास्थ्य जितना अच्छा होता है उनमें भाषा के विकास की गति उतनी तीव्र होती है।

  • बुद्धि हरलॉक के अनुसार जिन बच्चों का बौद्धिक स्तर उच्च होता है उनमें भाषा विकास अपेक्षाकृत कम बुद्धि से अच्छा होता है। टर्मन, फिशर एवं यम्बा का मानना है कि तीव्र बुद्धि बालकों का उच्चारण और शब्द भण्डार अधिक होता है।

सामाजिक-आर्थिक स्थिति बालको का सामाजिक-आर्थिक स्तर भी भाषा विकास को प्रभावित करता है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ने वाले बालकों की शाब्दिक क्षमता शहरी या अन्य पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले बालकों से कम होती है।

लिंगीय भिन्नता सामान्यत: बालिकाएँ बालकों की अपेक्षा अधिक शुद्ध उच्चारण करती हैं, किन्तु ऐसा प्रत्येक मामले में नहीं होता।

परिवार का आकार छोटे परिवार में बालक की भाषा का विकास बड़े आकार के परिवार से अच्छा होता है, क्योंकि छोटे आकार के परिवार में माता-पिता अपने बच्चे के प्रशिक्षण में उनसे वार्तालाप के जरिए अधिक ध्यान देते हैं।

बहुजन्म कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं जिनसे प्रमाणित होता है कि यदि एक साथ अधिक सन्तानें उत्पन्न होती हैं, तो उनमें भाषा विकास विलम्ब से होता है। इसका कारण है कि बच्चे एक-दूसरे का अनुकरण करते हैं और दोनों ही अपरिपक्व होते हैं। उदाहरण के लिए यदि एक बच्चा गलत उच्चारण करता है तो उसी की नकल करके दूसरा भी वैसा ही उच्चारण करेगा।

द्वि-भाषावाद यदि द्वि-भाषी परिवार है, उदाहरण के लिए यदि पिता हिन्दी बोलने वाला और माँ शुद्ध अंग्रेजी बोलने वाली हो, तो ऐसे में बच्चों का भाषा विकास प्रभावित होता है। वे भ्रमित हो जाते हैं कि कौन-सी भाषा सीखें?

परिपक्वता का तात्पर्य है कि भाषा अवयवों एवं स्वरों पर नियन्त्रण होना। बोलने में जिह्वा, गला, तालु, होंठ, दाँत तथा स्वर यन्त्र आदि जिम्मेदार होते हैं इनमें किसी भी प्रकार की कमजोरी या कमी वाणी को प्रभावित करती है। इन सभी अंगों में जब परिपक्वता होती है, तो भाषा पर नियन्त्रण होता है और अभिव्यक्ति अच्छीं होती है।

Notification
Welcome To All Study Notes Website. We Can Provide Here All Type Study Notes Helpfull For Student.Subjects Like Hindi Grammer, English Grsmmer, Physology, Science And Many More.
Done