क्रिया : परिभाषा, भेद और उदाहरण - All Study Notes
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24 May 2021

क्रिया : परिभाषा, भेद और उदाहरण

  जिस शब्द से किसी काम का करना या होना प्रकट हो, उसे क्रिया कहते हैं।

 जैसे-खाना, पीना, सोना, जागना, पढ़ना, लिखना, इत्यादि ।

संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण की तरह ही क्रिया भी विकारी शब्द है । इसके रूप लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार बदलते रहते हैं ।

क्रिया


धातु:

  • जिस मूल शब्द से क्रिया का निर्माण होता है, उसे धातु कहते हैं। धातु में ‘ना’ जोड़कर क्रिया बनायी जाती है ।

जैसे-

  • खा + ना = खाना
  • पढ़ + ना = पढ़ना
  • जा + ना = जाना
  • लिख + ना = लिखना।

शब्द-निर्माण के विचार से धातु भी दो प्रकार की होती हैं-

  1. मूल धातु और
  2. यौगिक धातु 

मूल धातु स्वतंत्र होती है तथा किसी अन्य शब्द पर आश्रित नहीं होती। जैसे-खा, पढ़, लिख, जा, इत्यादि ।

यौगिक धातु किसी प्रत्यय के संयोग से बनती है । जैसे-पढ़ना से पढ़ा, लिखना से लिखा, खाना से खिलायी जाती, इत्यादि ।

क्रिया के भेद

कर्म, जाति तथा रचना के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं

  1. अकर्मक क्रिया
  2. सकर्मक क्रिया

(1) अकर्मक क्रिया –

जिस क्रिया के कार्य का फल कर्ता पर ही पड़े, उसे अकर्मक क्रिया (Akarmak Kriya) कहते हैं । अकर्मक क्रिया का कोई कर्म (कारक) नहीं होता, इसीलिए इसे अकर्मक कहा जाता है ।जैसे-

  • श्याम रोता है।
  • वह हँसता है । 

इन दोनों वाक्यों में ‘रोना’ और ‘हँसना’ क्रिया अकर्मक हैं, क्योंकि यहाँ इनका न तो कोई कर्म है और न ही उसकी संभावना है । ‘रोना’ और ‘ हँसना।” क्रियाओं का फल कर्ता पर (ऊपर के उदाहरणों में ‘श्याम’ और ‘वह’ कर्ता हैं) ही पडता है ।

(2) सकर्मक क्रिया –

जिस क्रिया के कार्य का फल कर्ता पर न पड़कर किसी दूसरी जगह पड़ता हो, तो उसे सकर्मक क्रिया (Sakarmak Kriya) कहते हैं ।

सकर्मक क्रिया के साथ कर्म (कारक) रहता है या उसके साथ रहने की संभावना रहती है। इसीलिए इसे ‘सकर्मक” क्रिया कहा जाता है । सकर्मक अर्थात् कर्म के साथ । 

जैसे-

  • राम खाना खाता है ।

 इस वाक्य में खानेवाला राम है, लेकिन उसकी क्रिया ‘खाना’ (खाता है) का फल ‘खाना’ (भोजन) पर पड़ता है। एक और उदाहरण लें-वह जाता है । इस वाक्य में भी ‘जाना’ (जाता है) क्रिया सकर्मक है, क्योंकि इसके साथ किसी कर्म का शब्दत: उल्लेख न रहने पर भी कर्म की संभावना स्पष्ट रूप से प्रतीत होती है । ‘जाता है’ के पहले कर्म के रूप में किसी स्थान

 जैसे-

  • घर, विद्यालय या पटना जैसे गन्तव्य स्थान की संभावना स्पष्ट है ।

कुछ क्रियाएँ अकर्मक और सकर्मक दोनों होती हैं । वाक्य में प्रयोग के आधार पर उनके अकर्मक या सकर्मक होने का ज्ञान होता है । जैसे

  • अकर्मक: उसका शरीर खुजला रहा है ।
  • सकर्मक: वह अपना शरीर खुजला रहा है ।
  • अकर्मक: मेरा जी घबराता है ।
  • सकर्मक: मुसीबत किसी को भी घबरा देती है ।
  • अकर्मक क्रिया से सकर्मक क्रिया बनाना:

  1. एक अक्षरी या दो अक्षरी अकर्मक धातु में ‘लाना’ जोड़कर सकर्मक क्रिया बनायी जाती है । किंतु कहीं-कहीं धातु के दीर्घ स्वर को हृस्व तथा “ओकार” को “उकार” कर देना पड़ता है । जैसे-जीना-जिलाना, रोना-रुलाना
  2. दो अक्षरी अकर्मक धातु में कहीं पहले अक्षर अथवा कहीं दूसरे अक्षर के हृस्व को दीर्घ करके ‘ना’ प्रत्यय जोड़कर भी सकर्मक क्रिया बनायी जाती है । जैसे-उडना-उड़ाना, कटना-काटना
  3. दो अक्षरी अकर्मक धातु के दीर्घ स्वर को हृस्व करके तथा ‘आना’ जोड़कर सकर्मक क्रिया बनायी जाती है । जैसे-जागना-जगाना, भींगना-मिंगाना, आदि
  4. किंतु कुछ ‘अकर्मक’ धातुओं के स्वर में बिना किसी बदलाव के ही ‘आना’ जोड़कर भी सकर्मक क्रियाएँ बनायी जाती हैं ।  जैसे-चिढ़ना-चिढ़ाना
  5. दो अक्षरी अकर्मक धातुओं में ‘उकार’ को ‘ओकार’ तथा ‘इकार’ को ‘एकार’ में बदलकर तथा ‘ना’ जोड़कर भी सकर्मक क्रियाएँ बनायी जाती हैं।  जैसे -खुलना-खोलना, दिखना-देखना, आदि ।
  6. तीन अक्षरी अकर्मक धातुओं में दूसरे अक्षर के हृस्व स्वर को दीर्घ करके तथा अंत में ‘ना’ जोड़कर सकर्मक क्रियाएँ बनायी जाती हैं । जैसे-उतरना-उतारना, निकलना-निकालना, उखड़ना-उखाड़ना, बिगड़ना-बिगाड़ना ।
  7. कुछ अकर्मक धातुएँ बिना किसी नियम का अनुसरण किये ही सकर्मक में परिवर्तित की जाती हैं । जैसे-टूटना-तोड़ना, जुटना-जोड़ना ।

सकर्मक क्रिया के भेद-सकर्मक क्रिया के भी दो भेद हैं-

  1. एककर्मक तथा 
  2. द्विकर्मकः

(1) एककर्मक

जिस क्रिया का एक ही कर्म (कारक) हो, उसे एककर्मक (सकर्मक) क्रिया कहते हैं जैसे-वह रोटी खाता है | इस वाक्य में ‘खाना” क्रिया का एक ही कर्म ‘रोटी’ है ।

(2) द्विकर्मक

जिस क्रिया के साथ दो कर्म हों तथा पहला कर्म प्राणिवाचक हो और दूसरा कर्म निर्जीव हो अर्थात् प्राणिवाचक न हो । ऐसे वाक्य में प्राणिवाचक कर्म गौण होता है, जबकि निर्जीव कर्म ही मुख्य कर्म होता है । जैसे-नर्स रोगी को दवा पिलाती है। इस वाक्य में ‘रोगी” पहला तथा प्राणिवाचक कर्म है और ‘दवा’ दूसरा निर्जीव कर्म है ।

 संरचना (बनावट के आधार पर क्रिया के भेद):

संरचना के आधार पर क्रिया के चार भेद हैं-

  1. प्रेरणार्थक क्रिया,
  2. संयुक्त क्रिया, 
  3. नामधातु क्रिया तथा
  4.  कृदंत क्रिया

(1) प्रेरणार्थक क्रिया– (Prernarthak Kriya) 

जिस क्रिया से इस बात का ज्ञान हो कि कर्ता स्वयं कार्य न कर किसी अन्य को उसे करने के लिए प्रेरित करता है, उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं ।

जैसे-बोलना- बोलवाना, पढ़ना- पढ़वाना, खाना- खिलवाना, इत्यादि ।

प्रेरणार्थक क्रियाओं के बनाने की निम्नलिखित विधियाँ हैं-

  • (a) मूल द्वि-अक्षरी धातुओं में ‘आना’ तथा ‘वाना’ जोड़ने से प्रेरणार्थक क्रियाएँ बनती हैं ।

जैसे-पढ़ (पढ़ना) – पढ़ाना – पढ़वाना

चल (चलना) – चलाना – चलवाना, आदि ।

  • (b) द्वि-अक्षरी धातुओं में ‘ऐ’ या ‘ओ’ को छोड़कर दीर्घ स्वर हृस्व हो जाता है।

जैसे – जीत (जीतना) – जिताना – जितवाना

लेट (लेटना) – लिटाना – लिटवाना, आदि ।

  • (c) तीन अक्षर वाली धातुओं में भी ‘आना’ और ‘वाना’ जोड़कर प्रेरणार्थक क्रियाएँ बनायी जाती हैं । लेकिन ऐसी धातुओं से बनी प्रेरणार्थक क्रियाओं के दूसरे ‘अ’ अनुच्चरित रहते है ।

जैसे-समझ (समझना) – समझाना – समझवाना

बदल (बदलना) – बदलाना – बदलवाना, आदि ।

  • (d) ‘खा’, ‘आ’, ‘जा’ इत्यादि एकाक्षरी आकारान्त ‘जी’, ‘पी’, ‘सी’ इत्यादि ईकारान्त, ‘चू’, ‘छू-ये दो ऊकारान्त; ‘खे’, ‘दे’, ‘ले’ और ‘से’-चार एकारान्त: ‘खो’, ‘हो’, ‘धो’, ‘बी’, ‘ढो’, ‘रो’ तथा ‘सो”-इन ओकारान्त धातुओं में ‘लाना’, ‘लवाना’, ‘वाना’ इत्यादि प्रत्यय आवश्यकतानुसार लगाये जाते हैं ।
  • जैसे- जी (जीना) – जिलाना – जिलवाना

 (2) संयुक्त क्रिया 

 दो या दो से अधिक धातुओं के संयोग से बननेवाली क्रिया को संयुक्त क्रिया कहते हैं ।

  • जैसे-चल देना, हँस देना, रो पड़ना, झुक जाना, इत्यादि ।

(3) नामधातु क्रिया

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण इत्यादि से बननेवाली क्रिया को नामधातु क्रिया कहते हैं।

जैसे-हाथ से हथियाना, बात से बतियाना, दुखना से दुखाना, चिकना से चिकनाना, लाठी से लठियाना, लात से लतियाना, पानी से पनियाना, बिलग से बिलगाना, इत्यादि । ये संज्ञा या विशेषण में “ना” जोडने से (जैसे-स्वीकार-स्वीकारना, धिक्कार-धिक्कारना, उद्धार-उद्धारना, इत्यादि) तथा हिंदी शब्दों के अंत में ‘आ’ करके और आदि ‘आ’ को हृस्व करके (जैसे-दुख-दुखाना, बात—बतियाना, आदि) बनायी जाती हैं ।

(4) कृदंत क्रिया-

 कृत्-प्रत्ययों के संयोग से बनने वाले क्रिया को कृदंत क्रिया कहते हैं।

 जैसे – चलता, दौड़ता, भगता हँसता.

प्रयोग के आधार पर क्रिया के अन्य रूप:

  1. सहायक क्रिया 
  2. पूर्वकालिक क्रिया
  3. सजातीय क्रिया
  4. द्विकर्मक क्रिया 
  5. विधि क्रिया
  6. अपूर्ण क्रिया

  • (a) अपूर्ण अकर्मक क्रिया 
  • (b) अपूर्ण सकर्मक क्रिया 

(1) सहायक क्रिया-

मुख्य क्रिया की सहायता करनेवाली क्रिया को सहायक क्रिया कहते हैं ।

  • जैसे- उसने बाघ को मार डाला ।

सहायक क्रिया मुख्य क्रियां के अर्थ को स्पष्ट और पूरा करने में सहायक होती है । कभी एक और कभी एक से अधिक क्रियाएँ सहायक बनकर आती हैं । इनमें हेर-फेर से क्रिया का काल परिवर्तित हो जाता है ।

जैसे- 

  • वह आता है ।
  • तुम गये थे ।
  • तुम सोये हुए थे ।
  • हम देख रहे थे ।

इनमे आना, जाना, सोना, और देखना मुख्य क्रिया हैं क्योंकि इन वाक्यों में क्रियाओं के अर्थ प्रधान हैं ।

शेष क्रिया में- है, थे, हुए थे, रहे थे– सहायक हैं। ये मुख्य क्रिया के अर्थ को स्पष्ट और पूरा करती हैं ।

(2) पूर्वकालिक क्रिया-

जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त करके तत्काल किसी दूसरी क्रिया को आरंभ करता है, तब पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं ।

जैसे- 

  • वह गाकर सो गया।
  • मैं खाकर खेलने लगा ।

(3) सजातीय क्रिया-

 कुछ अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं के साथ उनके धातु की बनी हुई भाववाचक संज्ञा के प्रयोग को सजातीय क्रिया कहते हैं । जैसे-अच्छा खेल खेल रहे हो । वह मन से पढ़ाई पढ़ता है । वह अच्छी लिखाई लिख रहा है ।

(4) द्विकर्मक क्रिया-

कभी-कभी किसी क्रिया के दो कर्म (कारक) रहते हैं । ऐसी क्रिया को द्विकर्मकक्रिया कहते हैं । जैसे-तुमने राम को कलम दी । इस वाक्य में राम और कलम दोनों कर्म (कारक) हैं ।

(5) विधि क्रिया-

जिस क्रिया से किसी प्रकार की आज्ञा का ज्ञान हो, उसे विधि क्रिया कहते हैं । जैसे-घर जाओ । ठहर जा।

(6) अपूर्ण क्रिया-(Apurn Kriya)

जिस क्रिया से इच्छित अर्थ नहीं निकलता, उसे अपूर्ण क्रिया कहते हैं। 

इसके दो भेद हैं- 

  • अपूर्ण अकर्मक क्रिया तथा 
  • अपूर्ण सकर्मक क्रिया

(a) अपूर्ण अकर्मक क्रिया-कतिपय अकर्मक क्रियाएँ कभी-कभी अकेले कर्ता से स्पष्ट नहीं होतीं । इनके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इनके साथ कोई संज्ञा या विशेषण पूरक के रूप में लगाना पड़ता है। ऐसी क्रियाओं को अपूर्ण अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे – वह बीमार रहा । इस वाक्य में बीमार पूरक है।

(b) अपूर्ण सकर्मक क्रिया– कुछ संकर्मक क्रियाओं का अर्थ कर्ता और कर्म के रहने पर भी स्पष्ट नहीं होता । इनके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इनके साथ कोई संज्ञा या विशेषण पूरक के रूप में लगाना पडता है । ऐसी क्रियाओं को अपूर्ण सकर्मक क्रिया कहा जाता है ।

जैसे-

  • आपने उसे महान् बनाया । इस वाक्य में ‘महान् पूरक है.

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