सन्धि: परिभाषा व भेद और उदाहरण - All Study Notes
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01 June 2021

सन्धि: परिभाषा व भेद और उदाहरण

संधि की परिभाषा :- दो वर्णों के परस्पर मिलने पर यदि उनमें से किसी भी एक वर्ण में अथवा दोनों वर्णों में कोई विकार या परिवर्तन आ जाता है तो उसे संधि कहते है

  • दो वर्णों के परस्पर मिलने पर ही यदि उनमें कोई विकार या परिवर्तन नहीं आता है तो उसे संधि नहीं मानकर संयोग माना जाता है |
  • उद् + लेख – उल्लेख – द् का ल् – संधि
  • उद् + यान – उद्यान – द् + य् में कोई विकार नहीं – संयोग
सन्धि

संधि के भेद

संधि के प्रमुखतः तीन भेद होते है

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि

1. स्वर संधि

परिभाषा :- जब किसी स्वर वर्ण के साथ स्वर वर्ण का ही मेल होता है तो वहाँ स्वर संधि मानी जाती है

स्वर संधि के भी निम्नानुसार पाँच उपभेद माने जाते है

  1. दीर्घ स्वर संधि
  2. गुण स्वर संधि
  3. यण स्वर संधि
  4. वृद्धि स्वर संधि
  5. अयादि स्वर संधि

1. यण संधि

यदि इ , ई , उ , ऊ ,और ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो इनका परिवर्तन क्रमश: य , व् और र में हो जाता है

सूत्र: इको यणचि

  • इ का य = इति +आदि = इत्यादि
  • ई का य = देवी +आवाहन = देव्यावाहन
  • उ का व = सु +आगत = स्वागत
  • ऊ का व = वधू +आगमन = वध्वागमन
  • ऋ का र = पितृ +आदेश = पित्रादेश

अपवाद – यदि किसी शब्द में ‘स्व’ शब्दांश प्राप्त हो रहा हो एवं उसका अर्थ अपना/अपनी/अपने ग्रहण किया जा रहा हो तो वहाँ संधि-विच्छेद करते समय ‘स्व’ शब्दांश ‘+’ से पहले लिखा जाता है जैसे –

  • स्वाध्याय – स्व + अध्याय (दीर्घ संधि)
  • स्वावलम्बन – स्व + अवलम्बन (दीर्घ संधि)
  • स्वर्ग – स्व: + ग – (विसर्ग)
  • स्वेच्छा – स्व + इच्छा (गुण)

2. अयादि संधि

परिभाषा :- यदि ए, ऐ, ओ, औ के पशचात इन्हें छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो इनका परिवर्तन क्रमश: अय, आय, अव, आव में हो जाता है

  • ए का अय ने +अन = नयन
  • ऐ का आय नै +अक = नायक
  • ओ का अव पो +अन = पवन
  • औ का आव पौ +अन = पावन
  • न का परिवर्तन ण में = श्रो +अन = श्रवण

अपवाद –

नियम 1. – यदि ‘गो’ शब्द के साथ इन्द्र/अक्षि(अक्ष)/अग्र शब्द का मेल हो रहा हो तो ‘ओ’ को अव् में नहीं बदलकर ‘अव’ में बदला जाता है जैसे –

  • गो + इन्द्र – ग् + अव + इन्द्र – गवेन्द्र (अयादि/गुण)
  • गो + अग्र – ग् + अव + अग्र – गवाग्र (अयादि/दीर्घ)

नियम  2. – यदि ओ/औ स्वर के साथ य प्रत्यय अथवा युति शब्द का मेल हो रहा हो तो वहाँ पर भी अयादि संधि मानी जाती है एवं इनमें संधि करने पर ओ/औ के स्थान पर अव्/आव् आदेश किया जाता है जैसे –

  • गो + य – ग् + अव् + य – गव्य
  • गो + यूति – ग् + अव् + यूति – गव्यूति (दो कोस की दूरी)

3. गुण संधि

अ तथा आ के बाद इ, ई, उ, ऊ तथा ऋ आने पर क्रमश: ए, ओ तथा अर् होता है| जैसे – 

  • नर + इन्द्र – नरेन्द्र
  • महा + ईश – महेश
  • महा + उदधि – महोदधि
  • सूर्य + ऊष्मा – सूर्योष्मा
  • सप्त + ऋषि – सप्तर्षि
  • वर्षा + ऋतु – वर्षर्तु
  • जल + ऊर्मि – जलोर्मि
  • राका + ईश – राकेश

4. वृद्धि संधि 

यदि अ अथवा आ के बाद ए अथवा ऐ हो तो दोनों को मिलाकर ऐ और यदि ओ अथवा औ हो तो दोनों को मिलाकर औ हो जाता है जैसे –

  • अ + ए = ऐ – एक + एक = एकैक
  • अ + ऐ = ऐ – मत + ऐक्य = मतैक्य
  • अ + औ = औ – परम + औषध = परमौषध
  • आ + औ = औ – महा + औषध = महौषध
  • आ + ओ =औ – महा + ओघ = महौघ

अपवाद :-

नियम 1. – यदि प्र उपसर्ग के साथ ऊढ़/ऊढि/ऊह शब्दों का मेल हो रहा हो तो वहाँ गुण संधि नहीं होकर वृद्धि संधि होती है जैसे –

  • प्र + ऊढ़ – प्रौढ़
  • प्र + ऊह – प्रौह
  • प्र + उढ़वान – प्रोढवान

नियम 2. – यदि अक्ष शब्द के साथ ऊहिनी शब्द का मेल हो रहा हो तो वहाँ पर गुण संधि नहीं होकर वृद्धि संधि होती है जैसे –

  • अक्ष + ऊहिनी  – अक्षोहिणी (Sandhi In Hindi)

नियम 3. – यदि स्व शब्द के साथ ईर/ईरी/ईरिणी शब्दों का मेल हो रहा हो तो वहाँ पर भी गुण संधि न होकर वृद्धि संधि होती है जैसे –

  • स्व + ईर – स्वैर
  • स्व + ईरी – स्वैरी
  • स्व + ईरिणी – स्वैरिणी

5. दीर्घ संधि 

जब दो समान स्वर पास – पास आते हैं, तो मिलकर दीर्घ हो जाते हैं

  • अ + अ = आ – भाव + अर्थ = भावार्थ
  • इ + ई = ई – गिरि + ईश = गिरीश
  • उ + उ = ऊ – अनु + उदित = अनूदित
  • ऊ + उ =ऊ – वधू + उत्सव = वधूत्सव
  • आ + आ = आ – विद्या + आलय = विधालय

2. व्यंजन संधि

परिभाषा :-  जब किसी व्यंजन वर्ण के साथ किसी व्यंजन अथवा स्वर वर्ण का मेल होता है वहाँ व्यंजन संधि मानी जाती है

इस संधि में मुख्यतः निम्न तीन स्थितियां प्राप्त हो सकती है –

  • व्यंजन + स्वर – व्यंजन संधि
  • स्वर + व्यंजन – व्यंजन संधि
  • व्यंजन + व्यंजन – व्यंजन संधि

नियम 1. – तीसरे वर्ण की संधि का नियम

क्/च्/ट्/त्/प् + तीसरा/चौथा वर्ण / यरलव/ सभी स्वर आने पर क्/च्/ट्/त्/प् के स्थान पर क्रमश: ग्/ज्/ड्/द्/ब् हो जाता है

  • प्रति + छवि = प्रतिच्छवि
  • दिक् + अन्त = दिगन्त
  • दिक् + गज = दिग्गज
  • अच + अन्त = अजन्त

नियम 2. – क्/च्/ट्/त्/प् (द्) + पाँचवा वर्ण (न/म) होने पर क्/च्/ट्/त्/प् (द्) के स्थान पर क्रमश: ड़्/ञ्/ण्/न्/म् (न्) हो जाता है जैसे –

  • वाक् + मय – वाङमय
  • षट् + मुख – षण्मुख
  • उद् + मुख –  उन्मुख
  • जगत् + नाथ – जगन्नाथ 

3. विसर्ग संधि

परिभाषा :- जब विसर्ग के साथ किसी स्वर या व्यंजन वर्ण का मेल होता है, तो वहाँ विसर्ग संधि मानी जाती है जैसे –

  • मन: + रथ = मनोरथ
  • यश: + अभिलाषा = यशोभिलाषा
  • अध: + गति = अधोगति
  • नि: + छल = निश्छल
  • दु: + गम = दुर्गम

विसर्ग संधि के भेद

विसर्ग के स्थान पर होने वाले परिवर्तन के आधार पर विसर्ग संधि के मुख्यतः 3 भेद माने जाते है –

1. सत्व विसर्ग संधि

विसर्ग के स्थान पर श्/ष्/स् हो जाता है जैसे –

  • पुनः + च – पुनश्च
  • धनु: + टंकार – धनुष्टंकार
  • नि: + शुल्क – निश्शुल्क / निःशुल्क
  • हरि: + चन्द्र – हरिश्चन्द्र
  • दु: + साहस – दुस्साहस / दु:साहस

2. उत्व विसर्ग संधि

विसर्ग + कोई सघोष व्यंजन (3/4/5 वर्ण य,र,ल,व,ह) आने पर विसर्ग का ‘उ’ (ओ) हो जाता है जैसे –

  • मनः + ज – मनोज
  • सर: + ज – सरोज
  • पयः + ज – पयोज
  • पयः + द – पयोद
  • उर: + ज – उरोज
  • मनः + योग – मनोयोग

3. रुत्व विसर्ग संधि

 इ-ई/उ-ऊ + विसर्ग + सघोष वर्ण (3/4/5 वर्ण य,र,ल,व,ह, सभी स्वर) होने पर विसर्ग का ‘र’ हो जाता है जैसे –

  • बहि: + गमन – बहिर्गमन
  • बहि: + अंग – बहिरंग
  • आशी: + वाद – आशीर्वाद
  • यजु: + वेद – यजुर्वेद
  • धनु: + विद्या – धनुर्विद्या


दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं। इस मिलावट को समझकर वर्णों को अलग करते हुए पदों को अलग-अलग कर देना संधि-विच्छेद है। हिंदी भाषा में संधि द्वारा संयुक्त शब्द लिखने का सामान्य चलन नहीं है। पर संस्कृत में इसके बिना काम नहीं चलता है। संस्कृत के तत्सम शब्द ग्रहण कर लेने के कारण संस्कृत व्याकरण के संधि के नियमों को हिंदी व्याकरण में भी ग्रहण कर लिया गया है।


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