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17 June 2021

बाल विकास की अवधारणा

समय के साथ किसी व्यक्ति में हुए गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन को उस व्यक्ति का विकास कहा जाता है। विकास के कई आयाम होते हैं, जैसे- शारीरिक विकास, सामाजिक विकास, संज्ञानात्मक विकास, भाषायी विकास, मानसिक विकास आदि। किसी बालक में समय के साथ हुए गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन को बाल विकास कहा जाता है। बालक के शारीरिक, मानसिक एवं अन्य प्रकार के विकास कुछ विशेष प्रकार के सिद्धान्तों पर ढले हुए प्रतीत होते हैं। इन सिद्धान्तों को बाल विकास का सिद्धान्त कहा जाता है।

बाल विकास की अवधारणा



बाल विकास के सिद्धान्तों का ज्ञान शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने के लिए आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं सिद्धान्तों के ज्ञान के आधार पर शिक्षक बालक-बालिकाओं में समय के साथ हुए परिवर्तनों एवं उनके प्रभावों के साथ-साथ अधिगम से इसके सम्बन्धों को समझते हुए किसी विशेष शिक्षण प्रक्रिया को अपनाता है। किसी निश्चित आयु के बालकों की पाठ्यक्रम सम्बन्धी क्रियाओं को नियोजित करते समय शिक्षक को यह जानना आवश्यक हो जाता है कि उस आयु के बालकों में सामान्यत: किस प्रकार की शारीरिक व मानसिक क्षमता है, उन्हें किस प्रकार की सामाजिक क्रियाओं में लगाया जा सकता है तथा वे अपने संवेगों पर कितना नियन्त्रण रख सकते हैं? इसके लिए शिक्षक को उस आयु के सामान्य बालकों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिपक्वता के स्तर का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे वह उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करके उन्हें अपेक्षित दिशा प्रदान कर सके।

बाल विकास के सिद्धान्‍त


निरन्तरता का सिद्धान्त Principle of Continuity

इस सिद्धान्त के अनुसार विकास एक न रुकने वाली प्रक्रिया है। माँ के गर्भ से ही यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और मृत्यु-पर्यन्त चलती रहती है। एक छोटे से नगण्य आकार से अपना जीवन प्रारम्भ करके हम सबके व्यक्तित्व के सभी पक्षों-शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि का सम्पूर्ण विकास इसी निरन्तरता के गुण के कारण भली-भाँति सम्पन्न होता रहता है।

वैयक्तिक अन्तर का सिद्धान्‍त

इस सिद्धान्त के अनुसार बालकों का विकास और वृद्धि उनकी अपनी वैयक्तिकता के अनुरूप होती है। वे अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते रहते हैं और इसी कारण उनमें पर्याप्त विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। कोई भी एक बालक वृद्धि और विकास की दृष्टि से किसी अन्य बालक के समरूप नहीं होता। विकास के इसी सिद्धान्त के कारण कोई बालक अत्यन्त मेधावी, कोई बालक सामान्य तथा कोई बालक पिछड़ा या मन्द होता है।

विकास क्रम की एकरूपता

यह सिद्धान्त बताता है कि विकास की गति एक जैसी न होने तथा पर्याप्त वैयक्तिक अन्तर पाए जाने पर भी विकास क्रम में कुछ एकरूपता के दर्शन होते हैं। इस क्रम में एक ही जाति विशेष के सभी सदस्यों में कुछ एक जैसी विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए मनुष्य जाति के सभी बालकों की वृद्धि सिर की ओर प्रारम्भ होती है। इसी तरह बालकों के गत्यात्मक और भाषा विकास में भी एक निश्चित प्रतिमान और क्रम के दर्शन किए जा सकते हैं।

वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक-सी नहीं रहती

विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती तो है, किन्तु इस प्रक्रिया में विकास की गति हमेशा एक जैसी नहीं होती। शैशवावस्था के शुरू के वर्षों में यह गति कुछ तीव्र होती है, परन्तु बाद के वर्षों में यह मन्द पड़ जाती है। पुन: किशोरावस्था के प्रारम्भ में इस गति में तेजी से वृद्धि होती है, परन्तु यह अधिक समय तक नहीं बनी रहती। इस प्रकार वृद्धि और विकास की गति में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। किसी भी अवस्था में यह एक जैसी नहीं रह पाती। -

विकास सामान्य से विशेष की ओर चलता है

विकास और वृद्धि की सभी दिशाओं में विशिष्ट क्रियाओं से पहले उनके सामान्य रूप के दर्शन होते हैं। उदाहरण के लिए अपने हाथों से कुछ चीज पकड़ने से पहले बालक इधर से उधर यूँ ही हाथ मारने या फैलाने की चेष्टा करता है। इसी तरह शुरू में एक नवजात शिशु के रोने और चिल्लाने में उसके सभी अंग-प्रत्यंग भाग लेते हैं, परन्तु बाद में वृद्धि और विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप यह क्रियाएँ उसकी आँखों और वाक्तन्त्र तक सीमित हो जाती हैं। भाषा विकास में भी बालक विशेष शब्दों से पहले सामान्य शब्द ही सीखता है। पहले वह सभी व्यक्तियों को 'पापा' कहकर ही सम्बोधित करता है, इसके पश्चात् ही वह केवल अपने पिता को 'पापा' कहकर सम्बोधित करना सीखता है।

परस्पर-सम्‍बन्‍ध का सिद्धान्‍त

विकास के सभी आयाम जैसे- शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित हैं। इनमें से किसी भी एक आयाम में होने वाला विकास अन्य सभी आयामों में होने वाले विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए जिन बच्चों में औसत से अधिक वृद्धि होती है, वे शारीरिक और सामाजिक विकास की दृष्टि से भी काफी आगे बढ़े हुए पाए जाते हैं। दूसरी ओर, एक क्षेत्र में पाई जाने वाली दूसरे क्षेत्र में हो रही प्रगति में बाधक सिद्ध होती है। यही कारण है कि शारीरिक विकास की दृष्टि से पिछड़े बालक संवेगात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास में भी उतने ही पीछे रह जाते हैं।

एकीकरण का सिद्धान्त

विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धान्त का पालन करती है। इसके अनुसार, बालक पहले सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है। इसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है। सामान्य से विशेष की ओर बढ़ते हुए विशेष प्रतिक्रियाओं तथा चेष्टाओं को इकट्ठे रूप में प्रयोग में लाना सीखता है।

उदाहरण के लिए, एक बालक पहले पूरे हाथ को, फिर अँगुलियों को फिर हाथ एवं अँगुलियों को एकसाथ चलाना सीखता है।

विकास की भविष्यवाणी की जा सकती हैं

एक बालक की अपनी वृद्धि और विकास की गति को ध्यान में रखकर उसके आगे बढ़ने की दिशा और स्वरूप के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है। उदाहरण के लिए, एक बालक की कलाई की हड्डियों का एक्स किरणों से लिया जाने वाला चित्र यह बता सकता है कि उसका आकार-प्रकार आगे जाकर किस प्रकार का होगा? इसी तरह बालक को इस समय की मानसिक योग्यताओं के ज्ञान के सहारे उसके आगे के मानसिक विकास के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

विकास की दिशा का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार, विकास की प्रक्रिया पूर्व निश्चित दिशा में आगे बढ़ती है। विकास की प्रक्रिया की यह दिशा व्यक्ति के वंशानुगत एवं वातावरण जन्य कारकों से प्रभावित होती है। इसके अनुसार बालक सबसे पहले अपने सिर और भुजाओं की गति पर नियन्त्रण करना सीखता है और उसके बाद फिर टाँगों को। इसके बाद ही वह अच्छी तरह बिना सहारे के खड़ा होना और चलना सीखता है।

विकास लम्बवत् सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है

बालक का विकास लम्बवत् सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है। वह एक-सी गति से सीधा चलकर विकास को प्राप्त नहीं होता, बल्कि बढ़ते हुए पीछे हटकर अपने विकास को परिपक्व और स्थायी बनाते हुए वर्तुलाकार आकृति की तरह आगे बढ़ता है। किसी एक अवस्था में वह तेजी से आगे बढ़ते हुए उसी गति से आगे नहीं जाता, बल्कि अपनी विकास की गति को धीमा करते हुए वर्षों में । विश्राम लेता हुआ प्रतीत होता है ताकि प्राप्त वृद्धि और विकास को स्थायी रूप दिया जा सके। यह सब करने के पश्चात् ही वह आगामी वर्षों में फिर कुछ आगे बढ़ने की चेष्टा कर सकता है।

वृद्धि और विकास की क्रिया वंशानुक्रम और वातावरण का संयुक्त परिणाम

बालक की वृद्धि और विकास को किसी स्तर पर वंशानुक्रम और वातावरण की संयुक्त देन माना जाता है। दूसरे शब्दों में, वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में वंशानुक्रम जहाँ आधार का कार्य करता है वहाँ वातावरण इस आधार पर बनाए जाने वाले व्यक्तित्व सम्बन्धी भवन के लिए आवश्यक सामग्री एवं वातावरण जुटाने में सहयोग देता है। अत: वृद्धि और विकास की प्रक्रियाओं में इन दोनों को समान महत्व दिया जाना आवश्यक हो जाता है।

बाल विकास को प्रभावित करने वाले आन्तरिक कारक

बालक के विकास की प्रक्रिया आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से प्रभावित होती है।

वंशानुगत कारक 

बालक के रंग-रूप, आकार, शारीरिक गठन, ऊँचाई इत्यादि के निर्धारण में उसके आनुवंशिक गुणों का महत्वपूर्ण हाथ होता है। बालक के आनुवंशिक गुण उसकी वृद्धि एवं विकास को भी प्रभावित करते हैं। यदि बालक के माता-पिता गोरे हैं, तो उनका बच्चा गोरा ही होगा, किन्‍तु यदि काले है तो उनके बच्‍चे काले ही होगे। इसी प्रकार माता-पिता के अन्य गुण भी बच्चे में आनुवंशिक रूप से चले जाते हैं। इसके कारण कोई बच्चा अति प्रतिभाशाली एवं सुन्दर हो सकता है एवं कोई अन्य बच्चा शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर।

शारीरिक कारण

जो बालक जन्म से ही दुबले-पतले, कमजोर, बीमार तथा किसी प्रकार की शारीरिक बाधा से पीड़ित रहते हैं, उनकी तुलना में सामान्य एवं स्वस्थ बच्चे का विकास अधिक होना स्वाभाविक ही है। शारीरिक कमियों का स्वास्थ्य ही नहीं वृद्धि एवं विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। असन्तुलित शरीर, मोटापा, कम ऊँचाई, शारीरिक असुन्दरता इत्यादि बालक के असामान्य व्यवहार के कारण होते हैं। कई बार किसी दुर्घटना के कारण भी शरीर को क्षति पहॅुंचती है और इस क्षति का बालक के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

बुद्धि

 बुद्धि को अधिगम (सीखने) की योग्यता, समायोजन योग्यता, निर्णय लेने की क्षमता इत्यादि के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिस प्रकार बालक के सीखने की गति अधिक होती है, उसका मानसिक विकास भी तीव्र गति से होगा। बालक अपने परिवार समाज एवं विद्यालय में अपने आपको किस तरह समायोजित करता है यह उसकी बुद्धि पर निर्भर करता है।

संवेगात्‍मक कारक

बालक में जिस प्रकार के संवेगों का जिस रूप में विकास होगा वह उसके सामाजिक मानसिक, नैतिक, शारीरिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यदि बालक अत्यधिक क्रोधित या भयभीत रहता है अथवा यदि उसमें ईष्य एवं वैमनस्यता की भावना अधिक होती है, तो उसके विकास की प्रक्रिया पर इन सबक प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। संवेगात्मक रूप से असन्तुलित बालक पढ़ाई में व किसी अन्य गम्भीर कार्यों में ध्यान नहीं दे पाते, फलस्वरूप उनका मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।

सामाजिक प्रकृति

बच्चा जितना अधिक सामाजिक रूप से सन्तुलित होगा उसका प्रभाव उसके शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, भौतिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास पर भी उतना ही अनुकूल पड़ेगा। सामाजिक दृष्टि से कुशल बालक अपने वातावरण से दूसरों की अपेक्षा अधिक सीखता है।

बाल विकास को प्रभावित करने वाले बाह्य कारक

बाल के विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने में उपरोक्‍त आन्‍तरिक कारकों के साथ्‍

गर्भावस्था के दौरान माता का स्वास्थ्य एवं परिवेश

गर्भावस्था में माता को अच्छा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने की सलाह इसलिए दी जाती है कि उससे न केवल गर्भ के अन्दर बालक के विकास पर असर पड़ता है बल्कि आगे के विकास की बुनियाद भी मजबूत होती है। यदि माता का स्वास्थ्य अच्छा न हो, तो उसके बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य की आशा कैसे की जा सकती है? और यदि बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा न होगा तो उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है।

जीवन की घटनाऍ

जीवन की घटनाओं का बालक के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। यदि बालक के साथ अच्छा व्यवहार हुआ है, तो उसके विकास की गति सही होगी अन्यथा उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जिस बच्चे को उसकी माता ने बचपन में ही छोड़ दिया हो वह माँ के प्यार के लिए तरसेगा ही। ऐसी स्थिति में उसके सर्वागीण विकास के बारे में कैसे सोचा जा सकता है? जीवन की किसी दुर्घटना का भी बालक के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

बाल विकास की अवधारणा

भौतिक वातावर्ण

बालक का जन्म किस परिवेश में हुआ, वह किस परिवेश में किन लोगों के साथ रह रहा है? इन सबका प्रभाव उसके विकास पर पड़ता है। परिवेश की कमियों, प्रदूषणों, भौतिक सुविधाओं का अभाव इत्यादि कारणों से भी बालक का विकास प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है।

सामाजिक-आर्थिक स्थिति

बालक की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी उसके विकास पर पड़ता है। निर्धन परिवार के बच्चे को विकास के अधिक अवसर उपलब्ध नहीं होते। अच्छे विद्यालय में पढ़ने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने इत्यादि का अवसर गरीब बच्चों को नहीं मिलता, इसके कारण उनका विकास सन्तुलित नहीं होता। शहर के अमीर बच्चों को गाँवों के गरीब बच्चों की मानसिक एवं सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से अधिक होता है।

बाल विकास के सिद्धान्तों का शैक्षिक महत्व

बाल विकास के सिद्धान्तों के ज्ञान के फलस्वरूप शिक्षकों को बालकों की स्वभावगत विशेषताओं, रुचियों एवं क्षमताओं के अनुरूप सफलतापूर्वक अध्यापन में सहायता मिलती है।

बाल विकास के सिद्धान्तों से शिक्षकों को यह पता चलता है कि वृद्धि और विकास की गति और मात्रा सभी बालकों में एक जैसी नहीं पाई जाती। अत: व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए सभी बालकों से हर प्रकार के विकास की समान उम्मीद नहीं की जा सकती।

निचली कक्षाओं में शिक्षण की खेल-पद्धति मूलरूप से वृद्धि एवं विकास के मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है। बाल विकास के सिद्धान्तों से हमें यह जानकारी मिलती है कि विकास की किस अवस्था में बालकों में सीखने की प्रवृत्ति किस प्रकार की होती है? यह उचित शिक्षण-विधि अपनाने में शिक्षकों की सहायता करता है।

बालकों की वृद्धि और विकास के सिद्धान्तों से बालकों के भविष्य में होने वाली प्रगति का अनुमान लगाना काफी हद तक सम्भव होता है। इस तरह बाल विकास के सिद्धान्तों की जानकारी बालकों के मार्गदर्शन, परामर्श एवं निर्देशन में सहायक होकर उनके भविष्य निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाती है। बाल विकास के सिद्धान्तों से हमें यह भी पता चलता है कि एक ही मानव प्रजाति के सदस्यों में वृद्धि और विकास से सम्बन्धित कुछ समानताएँ पाई जाती हैं।

यदि बालक का विकास इस अनुरूप नहीं हो रहा हो, तो इस सिद्धान्त की जानकारी के अनुसार उसमें सुधार के प्रयास किए जा सकते हैं। वंशानुक्रम तथा वातावरण दोनों मिलकर बालक की वृद्धि और विकास के लिए उत्तरदायी हैं, कोई एक नहीं। इस बात का ज्ञान वातावरण में आवश्यक सुधार लाकर बालकों की प्रगति में सहायक बनने में शिक्षकों की मदद करता है। वंशानुक्रम और वातावरण दोनों बालक की वृद्धि और विकास के लिए उत्तरदायी हैं। यह सिद्धान्त हमें बताता है कि बालक की वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में वंशानुक्रम और वातावरण दोनों को समान महत्व दिया जाना आवश्यक है। वृद्धि और विकास की सभी दिशाएँ अर्थात् विभिन्न पहलू जैसेमानसिक विकास, शारीरिक विकास, संवेगात्मक विकास और सामाजिक विकास आदि परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। 

इस बात का ज्ञान शिक्षकों और अभिभावकों को बालक के सर्वागीण विकास पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है। आने वाले समय में वृद्धि और विकास को ध्यान में रखते हुए क्या-क्या विशेष परिवर्तन होंगे? इस बात का ज्ञान भी बाल विकास के सिद्धान्तों के आधार पर हो सकता है। यह ज्ञान न केवल अध्यापकों बल्कि माता-पिता को भी विशेष रूप से तैयार रहने के लिए एक आधार प्रदान करता है तथा बच्चों की विभिन्न समस्याओं का समाधान करने में उन्हें सहायता मिलती है। बाल विकास के सिद्धान्तों के ज्ञान से बालक की रुचियों, अभिवृत्तियों, क्षमताओं इत्यादि के अनुरूप उचित पाठ्यक्रम के निर्धारण एवं समय-सारिणी के निर्माण में सहायता मिलती है।

बालक के व्यक्तित्व के सर्वागीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि उसके व्यवहार की जानकारी शिक्षक को हो। बालक के व्यवहार के बारे में जानने के बाद उसकी समस्याओं का समाधान करना आसान हो जाता है। बाल विकास का अध्ययन शिक्षक को इस बात की स्पष्ट जानकारी दे सकता है कि बालक की शक्तियों, योग्यताओं, क्षमताओं तथा व्यवहार एवं व्यक्तिगत गुणों के विकास में आनुवंशिकी तथा वातावरण किस सीमा तक किस रूप में उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं? यह जानकारी शिक्षक को अपने उत्तरदायित्वों का सही ढंग से पालन करने में सहायक होती है।

किस आयु वर्ग या अवस्था विशेष में बालक के विकास का क्या सामान्य स्तर होना चाहिए? इस बात के ज्ञान से अध्यापक को अपने शिक्षण के उचित नियोजन में पूरी सहायता मिलती है। विकास स्तर की दृष्टि से वह बालकों को सामान्य, अति सामान्य तथा सामान्य से नीचे जैसी श्रेणियों में विभाजित कर सकता है तथा फिर उनकी शिक्षा एवं समायोजन व्यवस्था को उन्हीं के उपयुक्त रूप में ढालने का प्रयत्न कर सकता है।

वृद्धि एवं विकास के विभिन्न आयामों में से किसी एक आयाम में बहुत अधिक तथा किसी दूसरे में उपेक्षित न रह जाए-इस बात को ध्यान में रखकर सर्वागीण विकास के लिए प्रयत्नरत रह सकता है।

विकास की प्रक्रिया विभिन्न आयु वर्ग तथा अवस्था विशेष में किस प्रकार सम्पन्न होती है?

 वह किन बातों से किस रूप में प्रभावित होती है? इस बात का ज्ञान अध्यापक को ऐसी उपयुक्त शिक्षण अधिगम परिस्थितियों तथा विकास वातावरण के निर्माण में सहयोग दे सकता है, जिससे बालकों का अधिक-से-अधिक पूर्ण एवं सर्वागीण विकास हो सके।

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